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नन्हीं कली पर बंदिशों का बोझ

Agra

Updated Thu, 06 Dec 2012 05:30 AM IST
आगरा। मम्मी! मुझे बाहर खेलने क्यों नहीं जाने देती? क्या जवाब इस सवाल का। मेेरे अंदर के डर को वो कैसे समझेगी। मीठी मीठी बातों से बहला देती हूं लेकिन देखती हूूं कि वह बुझ सी जाती है। यह व्यथा उस मां का है जिसकी बच्चियां हैं। बढ़ती सामाजिक विकृति से बच्चियों का बचपन छिन गया है। गुड़िया रानी हर पल नजरों में है तो ठीक नहीं तो दिल में धुकधुकी होने लगती है।
सात वर्षीय इशिका बसंल की मां सरिता, संत नगर ने बताया कि मुझसे ज्यादा पति बेटी को लेकर परेशान रहते हैं। जब तक वह स्कूल से घर नहीं आ जाती, चिंता बनी रहती है। छुटपन में मुझ पर कोई रोक नहीं थी लेकिन आज मजबूरन अपनी बच्ची पर बंदिशें लगानी पड़ती हैं।

जॉब करने वाली सोनी, संत नगर अपनी 12 साल की बेटी दीया को लेकर बहुत कॉन्सस हैं। उन्होंने बताया कि जरा सी देर होने पर आटो वाले का फोन खटखटाना शुरू कर देती हूं। वह गेट पर भी खड़ी हो तब भी मुझे डर लगता है।

साढे़ आठ साल की जूही की मां मोना, कमला नगर के अनुसार क्राइम बहुत बढ़ गया है। अब बेटी आंखों के सामने ही सेफ है। मैं जूही को अपने साथ ही पार्क में खेलने के लिये ले जाती हूं। हर वक्त एक डर लगा रहता है।

फूल वाटिका निवासी अविका की दो बेटियां श्रेया और हिति (8 व 4 वर्षीय) हैं। उन्होंने बताया कि बेटियों को लेकर दिमाग में नकारात्मक विचार बहुत आने लगे हैं। जब तक वे घर नहीं आ जाती, चैन नहीं पड़ता।


हमारे समाज में लड़की और लड़के का दर्जा बराबर नहीं है। भेदभाव की यह मानसिकता ही अपराधों की जड़ है। बच्चियों के साथ बढ़ते दुराचारों का प्रमुख कारण गांवों से शहरों की तरफ तेजी से बढ़ता पलायन भी है। निर्धन वर्ग बिना परिवार के माइग्रेट हो रहा है। सेक्सुअल आउटलेट नहीं होने से वह जानवर की तरह व्यवहार करने लगता है।
समाजशास्त्री मोहम्मद अरशद।

जो पीढ़ी इस समय से गुजर रही है, वह आगे चलकर ट्रबल करेगी। कम उम्र में हो रही घटनाएं बच्चियों के मन में अपने जेंडर के प्रति हीन भावना पैदा करती है। उनमें कुंठा घर कर जाती है। युवावस्था में नये रिश्ते में प्रवेश के बाद इंटीमेसी, डिपेंडेंसी कम रहती है। मां को अपनी बदलाव के बारे में बेटी को एजूकेट करना चाहिए।
मनोचिकित्सक विशाल
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