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लचर सिस्टम के आगे लाचार महिलाएं

Agra

Updated Sun, 25 Nov 2012 12:00 PM IST
आगरा। कर्तव्यों से घिरी नारी अपने अधिकारों की ओर ओट किये रही। सदा से ही स्त्री के साथ ‘सहना’ शब्द जुड़ा हुआ था। अपने ऊपर हुए उत्पीड़न को वह अपराध ही नहीं मानती थी। शिक्षा ने औरत को जागरूक किया और घरों में बंद अत्याचार की कहानियां कोर्ट और थानों तक पहुंची लेकिन इंसाफ नहीं मिला। लचर सिस्टम के सामने महिला फिर लाचार हो गई। औरत के उत्पीड़न के खिलाफ बने कानून धरातल पर धराशाई हो गये। 2005 में लागू हुआ घरेलू हिंसा एक्ट भी पीड़िताओं को राहत न दे सका। एक्ट के प्रावधान कागजों पर ही सिमट कर रह गये। पत्नी हो या मां, या बेटी, अपनों के शोषण से आज भी सिसक रही है। अधिकांश मामले लंबित पड़े हैं।
जमीनी स्तर पर हुआ फेल
अधिवक्ता अरविंद गुप्ता ने बताया कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम के सेक्शन 13 के अनुसार डीपीओ को तीन दिन के अंदर सर्वे कर अपनी आख्या देनी चाहिए लेकिन उसे इस काम में महीनों लग जाते हैं।
नहीं बन पाए शेल्टर होम
लीगल एडवाइजर या वकील की फीस के लिये पीड़िता को आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं होता।
सेक्शन 12 सब क्लॉज 4 में दिया गया है कि केस फाइल होने के बाद मजिस्ट्रेट जो सुनवाई की पहली तारीख नियत करेगा, वह 30 दिन से अधिक नहीं होगी। सब क्लाज 5 में मजिस्ट्रेट उप धारा के अधीन 60 दिन की अवधि के अंदर केस का निस्तारण करेग लेकिन अधिकांश केस के निस्तारण में करीब तीन साल लग जाते हैं। मेरे पास ही 100 फाइलें पेंडिंग पड़ी हैं। असिस्टेंट आफ वेलफेयर एक्सपर्ट, चिकित्सकीय मदद भी नहीं मिलती।

केस स्टडी
पति के अत्याचारों से आजिज अर्चना ने 2008 में उसके खिलाफ घरेलू हिंसा का मुकदमा दर्ज कराया। 2009 में कोर्ट ने अर्चना के मेंटीनेंस के लिये 2.5 हजार रुपये देने के आर्डर दिये लेकिन आज तक अदालत एक रुपये रिकवर नहीं करा पाई।

दामिनी ने 2010 में पति के खिलाफ घरेलू हिंसा का मामला दर्ज कराया लेकिन आज तक डीपीओ ने उसकी तामील नहीं दी है। तीन दिन की रिपोर्ट डीपीओ दो साल में नहीं दे पाए।

घरेलू हिंसा के लंबित मामले 652 (जनवरी - अक्टूबर 2012)
कुल मामले करीबन 750

एड. अरविंद गुप्ता के अनुसार सरकार को घरेलू हिंसा एक्ट को लेकर इंस्ट्र्र्रक्शन देने चाहिए। फैमिली कोर्ट की तरह घरेलू हिंसा के मामलों की कोर्ट अलग की जा सकती है।


डीपीओ आरएन अग्निहोत्री से इस बारे में पूछा गया तो उनका जवाब एक लाइन का था, यह कोर्ट से संबंधित है, मुझसे नहीं।
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