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वक्त के साथ बदला गांधी चरखे का स्वरूप

Agra

Updated Tue, 02 Oct 2012 12:00 PM IST
आगरा। एक समय वह भी था जब खादी सिर्फ वस्त्र नहीं विचारधारा हुआ करती थी, लेकिन समय के साथ गांधी वादियों की इस विचारधारा के मायने बदलते गए। इसके साथ ही बदलता गया खादी तैयार करने वाले चरखे का स्वरूप। गांधी जी सूत कातने में जिस चरखे का इस्तेमाल करते थे, अब उनका प्रयोग कम ही किया जाता है। बदलते वक्त के साथ एक तकली से दो तकली के चरखे, फिर छह से लेकर अब आठ तकली के चरखे चलन में हैं। खादी के वस्त्रों को तेज गति से बनाने के लिए आजकल आठ तकली वाले एनएमसी चरखे प्रयोग में लाए जा रहे हैं।
हालांकि खादी के वस्त्र महंगे होने के कारण आज इनका प्रयोग सीमित लोग ही करते हैं। इसके बावजूद ग्रामीण अंचल में खादी का उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जाता है। आगरा के बरहन, बहरामपुर, सैमरा, फतेहपुर सीकरी, एटा के अलीगंज, मारहरा, गंजडुंडवारा समेत कई स्थानों पर खादी ग्रामोद्योग से जुड़ी इकाइयां कार्यरत हैं।


गांधी चरखा: शहर के गांधी आश्रमों में गांधी चरखा उपलब्ध नहीं है। यह चरखा फतेहपुर सीकरी के आश्रम में मौजूद है। ढोल के आकार वाले इस चरखे का इस्तेमाल गांधीजी करते थे।

देशी चरखा: देशी चरखे बहुतायत में मिल जाते हैं। एक तकली वाले यह चरखे क्षेत्रीय गांधी आश्रम और मोतीगंज के आश्रम में उपलब्ध हैं। इनके प्रयोग से बहुतायत में सूत कातना मुश्किल होता है।

अंबर चरखे: करीब पंद्रह साल पहले अंबर चरखों का चलन शुरू हुआ। इनमें एक साथ आठ तकलियों से सूत की कताई होती है। इससे उत्पादन भी तेज गति से होता है। मोतीगंज गांधी आश्रम के व्यवस्थापक दीनदयाल त्यागी ने बताया कि अंबर चरखों का प्रयोग कुछ सालों से बढ़ा है। इनको मुख्यत: समूह बनाकर खादी के वस्त्र बनाने में प्रयोग किया जाता है। लोहे के चरखों के बाद अब लकड़ी में भी अंबर चरखे आ रहे हैं।

एनएमसी चरखे: अब चलन में एनएमसी चरखे ही हैं। इनका प्रयोग बुनकर करते हैं। इनसे मोटी खादी तैयार होती है। यहां के सूत से मोटी खादी के वस्त्र ही तैयार होते हैं।

चरखों का एक ही है मिस्त्री
क्षेत्रीय गांधी आश्रम के मंत्री शंभूनाथ चौबे (एडवोकेट) बताते हैं कि चरखों की मरम्मत हर जगह नहीं हो पाती है। पिछले चालीस साल से गांधी आश्रम पर एक मिस्त्री चरखों की मरम्मत करता आ रहा है। चरखों के पार्ट्स भी वह उपलब्ध कराते हैं।

खादी पर भी आधुनिकता का रंग
गांधी आश्रम के मंत्री श्री चौबे का कहना है कि खादी तैयार करने में जलवायु की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। बंगाल के वातावरण में नमी है। इसके चलते वहां काफी महीन सूत तैयार हो जाता है। जबकि इस क्षेत्र में कुछ मोटी खादी तैयार होती है। उन्होंने बताया कि एक ही तरह के डिजाइन की शिकायत दूर करने को केवीआईसी अब डिजाइनरों की सेवाएं ले रहा है। डिजाइनर बुनकरों को प्रशिक्षण दिया जाएगा, इसके बाद खादी में भी आधुनिक डिजाइन देखने को मिलेंगे।

खादी पर छूट तीन अक्तूबर से
खादी के वस्त्रों पर तीन अक्तूबर से 10 फीसदी की छूट दी जा रही है। यह छूट प्रदेश सरकार 108 दिनों के लिए दे रही है। उन्होंने बताया कि खादी की खरीद में तेजी अक्तूबर से लेकर जनवरी तक रहती है।
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