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कहीं कहानी के पन्नों में न सिमट जाए ‘भदावरी’

Agra

Updated Mon, 20 Aug 2012 12:00 PM IST
आगरा। कभी जिले की शान और किसानों की पहचान कहीं जाने वाली भदावरी भैंस का अस्तित्व खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है। आजादी के दो दशक बाद तक जिले और चम्बल के बीहड़ में इन्हीं भैंसों को क्वीन कहा जाता था, लेकिन अब बाह तहसील के भदावर इलाके से पैदा यह नस्ल बहुत कम दिखाई देती है। ऐसे में कहीं ऐसा न हो कि भदावरी भैंस कहानी के पन्नों में सिमट जाए और एक इतिहास बनकर रह जाए।
कृषि विज्ञान केन्द्र बिचपुरी के पशु वैज्ञानिक डा. सत्येन्द्र पाल सिंह बताते हैं कि बाह तहसील के भदावर इलाके से ही भदावरी नस्ल की उत्पत्ति हुई थी। यह आगरा, इटावा, मैनपुरी, अलीगढ़ और चम्बल के बीहड़ क्षेत्रों में पाई जाती थी। इसमें ज्यादा दूध तो नहीं होता है, पर घी फैट की मात्रा अन्य पशुओं की अपेक्षा दोगुनी होती है। यह दोनों समय कुल मिलकार पांच से सात लीटर दूध देती हैं, पर फैट 13 से 14 फीसदी तक पाया जाता है, जबकि अन्य भैंसों और दुधारू पशुओं में फै ट की मात्रा छह से सात फीसदी ही होती है। पहले इसे हर घर की शान माना जाता था, लेकिन अब लोग इसे पालने में हिचकिचा रहे हैं।
वैसे आजादी के दो दशक बाद तक तो इनका बोलाबाला रहा है। चन्द्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय कानपुर, शोध के संयुक्त निदेशक डा. हरज्ञान प्रकाश कुशवाहा ने कहा कि सबसे अधिक घी देने वाली और कम रोगों वाली भैंस को संरक्षित करना देश व प्रदेश दोनों के लिए हितकर है।

इतिहास
जैकएरेह नामक वैज्ञानिक ने इस नस्ल की खोज भदावन नाम से की थी। उस समय इसमें 14 फीसदी फैट मिला था। बाद में कौर नामक कृषि वैज्ञानिक ने 1950 व 1961 के बीच नस्ल का भदावरी नाम दिया। इनकी खासियत यह है कि ये 48 डिग्री तापमान भी आसानी से बर्दास्त कर लेती हैं। इनका दूध काफी मीठा होता है। भदावरी भैंस अधिकतर धूसर कलर और कम बाल वाली होती है। कभी-कभी एकदम भूरी भी पाई जाती हैं। सिर छोटा पूंछ लम्बी, पतली और लचीली होती है। अंत भाग सफेद या ब्लैक बालों का गुच्छा होता है। पहले यह आगरा, इटावा, कानपुर, जालौन व आधा झांसी, चम्बल, ग्वालियर के क्षेत्र में पाई जाती थी।

आगरा में भैंस व गायों की संख्या
2007 की पशु जनगणना के अनुसार जिले में 926670 भैंस और 210528 गाय हैं। इनमें भदावरी की संख्या न के बराबर है।

फिर संजोने का प्रयास
अब पशु पालक पशुओं को व्यवसाय की दृष्टि से पालते हैं, जो जानवर अधिक दूध देते हैं। किसान उन्हीं को प्राथमिकता के तौर पालते हैं। दूध अब गांव के लोगों की रोजी-रोटी बन गई है। यह वजह भी इस भैंस की कमी का कारण है।

दूसरी दुग्ध क्रांति के तहत फिर से संजोने का प्रयास
दूसरी दुग्ध क्रांति के तहत और विलुप्त हो रहे दुधारू पशुओं को बचाने के लिए भारत सरकार ने पहल की है।भारत सरकार की राष्ट्रीय अनुवांशिक संस्थान की ओर से ऐसे पशुओं को बचाने के प्रयास शुरू हो गए हैं। फिलहाल यह अभियान हरियाणा के करनाल जिले से शुरू हो गया है।
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