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आजादी की अलख जगाने को जन्मी रामलीला

Agra

Updated Wed, 01 Aug 2012 12:00 PM IST
आगरा। गुलामी के खिलाफ भारतीयों का गुबार फूटा तो गोरों की सांस घुटने लगी। फिरंगियों का दमन चक्र तेज हो गया। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेज और भी सचेत हो गये। संगीनों के साए में शहर उदास खड़ा था। ऐसी विषम परिस्थितियों में धर्म और लोक संस्कृति स्वतंत्रता आंदोलन की संजीवनी बने। समाज को संगठित कर चेतना जागृत करने, हृदय में देश भक्ति के अंकुर रोपने का कार्य लोक परंपराओं के माध्यम से किया गया। 1857 की क्रांति के दौरान गोकुल पुरा में अज्ञातवास पर रहे स्वतंत्रता सेनानी तात्या टोपे ने क्षेत्र के लोगों को एक सूत्र में बांधने के लिए गणेश उत्सव प्रारंभ कराया। जन जन में मातृ प्रेम जागृत करने के लिए ही उत्तर भारत की प्रसिद्ध रामलीला का श्री गणेश किया गया। सन् 1880 में मन: कामेश्वर की बारहदरी से प्रारंभ की गई रामलीला ने हर वर्ग के लोगों को जोड़ा। यही नहीं धर्म के इस मंच पर गूंजते धरती मैया (भारत माता) के जयकारों ने जन चेतना जागृत करने का कार्य किया।
प्राचीन मन: कामेश्वर मंदिर के प्रशासक हरिहर पुरी ने बताया कि मंदिर के पूर्व महंत गोविंद पुरी ने बारहदरी में 1880 में रामलीला का आयोजन कराया था। इसका प्रमुख उद्देश्य आजादी के आंदोलन को सभी तक पहुंचाना था। धर्म अभिव्यक्ति की आवाज बना था। धार्मिक कार्यक्रम होने के कारण विदेशी हुकूमत का हस्तक्षेप भी नहीं था। रामलीला ने ब्राह्मण, वैश्य आदि वर्गों को आपस में जोड़ा। ब्राह्मण बच्चे स्वरूप बना करते थे। चरित्रों के मंचन के माध्यम से देश भक्ति का संदेश दिया जाता था। सीता माता धरती से उत्पन्न बताई गई हैं। हल खोदते हुए सीता माता की उत्पत्ति हुई। बारादरी में सीता माता, धरती मैया की जय जयकार गूंज उठती। पहले शहर यही बसता था। यह क्षेत्र स्वतंत्रता संघर्ष का गढ़ था। यहां से निकला संदेश समूचे मंडल तक पहुंचता था। हमारे पिता महंत उद्धवपुरी भी वानर सेना से जुड़े हुए थे। मन: कामेश्वर मंदिर स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों से जुड़ा हुआ था।
मंदिर के पूर्व महंत स्व. उद्धव पुरी ने अतीत की स्मृतियां लेख में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी घटनाओं का जिक्र्र किया है। उन्होंने लिखा है कि उन दिनों आगरा फोर्ट के सामने मेरे मंदिर के आगे टीले होते थे। उनके सामने जहां आज आगरा फोर्ट स्टेशन है, वहां पहले गोदाम हुआ करता था। अब हमारा दिन भर का प्रमुख काम मिश्रा लॉज हाईस्कूल को छोड़कर इन स्थलोंपर हरिनारायण जोशी के नेतृत्व में नारे लगाना, वानरी सेना में रहते हुए अपने मंदिर के टीलों पर से माल गोदाम के शीशे तोड़ने का होता था। 1944 के विरोध प्रदर्शन में भाग लेेने के कारण पिता जी ने मुझे कैलाश स्थित ऋषिकुल ब्रह्मचर्याश्रम में कठोर नियंत्रण की शिक्षा में डाल दिया।

स्वतंत्रता सेनानियों की शरण स्थली मन: कामेश्वर
उद्धव पुरी के संस्मरणों के अनुसार आगरा के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी स्व. श्री कृष्ण दत्त पालीवाल, उनके सहायक मिश्रीलाल और शिरोमणि बंधु पुलिस की नजरों से बचने के लिए मंदिर में ही शरण लेते थे।

उल्टे पांव लौट गया अंग्रेज कलक्टर
1944 में मन: कामेश्वर मंदिर की बारहदरी में श्री राम लीला का राज्याभिषेक होना था। कार्यक्रम में अंग्रेज कलक्टर को भी बुलाया गया। मंदिर के पूर्व महंत स्व. उमामहेश्वर पुरी को जब यह पता चला तो उन्होंने प्रभु राम का राज्याभिषेक का तिलक करने से मना कर दिया। स्थानीय लोगों ने भी महंत श्री का साथ दिया। विरोध प्रदर्शन को देखते हुए अंग्रेज कलक्टर को उल्टे पांव लौटना पड़ा।

अगले अंक में पढ़ेंगे : नया मोर्चा सरकार ने किसानों में भरा जोश
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