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एक और हताश छात्रा फंदे पर लटकी

Lucknow

Updated Fri, 28 Dec 2012 05:30 AM IST
लखनऊ। कहते हैं कि जब सपनों को पूरा करने का जज्बा हो और हौसले बुलंद हों तो कोई भी परिस्थिति उसे तोड़ नहीं सकती। इसके बावजूद शहर के युवाओं और स्टूडेंट्स को हताशा घेर रही है और जिंदगी की जंग लड़ने से पहले ही वे जिंदगी हार रहे हैं। बुधवार को कृष्णा नगर में एक दरोगा की 22 वर्षीय बेटी ने खुद को गोली मारी थी और गुरुवार को एक और होनहार छात्रा ने फांसी लगा ली। हाईस्कूल की छमाही परीक्षा में आए कम नंबर आशियाना की होनहार छात्रा के सपनों पर भारी पड़ गए और वह फंदे पर झूल गई। पुलिस के मुताबिक आशियाना क्षेत्र में 2/502 रुचिखंड- दो में इंजीनियर धर्मेंद्र सिंह अपने परिवार के साथ रहते हैं। वे वर्तमान में अमेठी में सिंचाई विभाग में जेई के पद पर तैनात हैं। उनकी 14 वर्षीय बेटी सुगंधा डीपीएस एल्डिको ब्रांच में हाईस्कूल की छात्रा थी। वह पढ़ाई में काफी अच्छी और मेधावी थी। हर क्लास में हमेशा से उसके 100 प्रतिशत नंबर आते थे। तीन दिन पहले ही हाईस्कूल अर्धवार्षिक परीक्षा की कॉपियां दिखाई गई थीं जिसमें उसे 10 में से 9.6 मार्क्स आए थे। इससे वह परेशान और हताश थी। बुधवार को वह अपनी मां सुशीला के साथ ही घर की पहली मंजिल पर सोई थी और अगले दिन सुबह चार बजे उठकर नीचे ड्रॉइंग रूम में पढ़ने चली गई। यह उसकी आदत थी। गुरुवार सुबह सात बजे तक पढ़ने के बाद जब वह स्कूल जाने के लिए तैयार नहीं हुई तो मां ने आवाज लगाई। कोई प्रतिक्रिया न होने पर उन्हें शक हुआ। नीचे आकर देखा तो उनके होश उड़ गए। सुगंधा दुपट्टे के जरिए पंखे से लटकी थी। घबराई सुशीला ने अमेठी में पति धर्मेंद को तत्काल फोन कर इसकी सूचना दी। धर्मेंद्र ने तुरंत इसकी सूचना पुलिस को दी और घर के लिए निकल पड़े। मौके पर पहुंची पुलिस ने लोगों की मदद से सुगंधा को पंखे से नीचे उतारा पर तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। धर्मेंद्र के घर पहुंचने के बाद पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।
कठिन और सतत परिश्रम से आगे बढ़ने में था विश्वास ः घर वालों की मानें तो सुगंधा शुरुआत से ही मेधावी छात्रा थी। हर क्लास में वह अव्वल ही रहती थी। कठिन और सतत परिश्रम कर आगे बढ़ने में वह विश्वास करती थी। आगे चलकर वह आईएएस अफसर बनना चाहती थी। मां सुशीला बार-बार ही ये बात कहकर बेसुध हो जा रही थीं। पांचवीं में पढ़ने वाला उसका भाई विकास उर्फ बिट्टू गुमसुम होकर यह सब देख रहा था। पिता धर्मेंद्र का भी रो-रोकर बुरा हाल था। परिजन और रिश्तेदार सभी को संभालने का प्रयास कर रहे थे लेकिन सुगंधा की मां के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
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