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काल ने लिखी कथा, नहीं रहे कामतानाथ

Lucknow

Updated Sat, 08 Dec 2012 05:30 AM IST
लखनऊ। भले ही उनके कहानी संग्रह का नाम ‘सब ठीक हो जाएगा’ हो लेकिन सब ठीक नहीं हुआ। कुछ माह पहले उनके कैंसर से पीड़ित होने की खबर आई थी और शुक्रवार की रात प्रसिद्ध साहित्यकार कामतानाथ ने आंखें मूंद ली। काल ने अपनी कथा लिख दी। ‘कालकथा’ के लेखक कामतानाथ का शुक्रवार रात करीब नौ बजे लोहिया इंस्टीट्यूट में निधन हो गया। वे 78 वर्ष के थे। उनके निधन से साहित्य, संस्कृति जगत में शोक की लहर व्याप्त है।
वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ को कैंसर से पीड़ित होने की जानकारी तीन माह पूर्व ही मिली थी। उन्हें लीवर का कैंसर था। वे कुछ दिनों पूर्व ही लोहिया इंस्टीट्यूट में भर्ती हुए थे। दो दिनों से उन्हें बोलने में दिक्कत हो रही थी। शुक्रवार रात करीब 8.45 बजे उनकी स्थिति गंभीर हो गई। चिकित्सकों ने करीब नौ बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया। इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. एम.सी.पंत ने बताया कि उनका कैंसर काफी गंभीर अवस्था में पहुंच गया था। उनके लीवर ने काम करना बंद कर दिया था। उनके निधन की खबर मिलते ही राकेश, वीरेंद्र यादव, सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ सहित कई संस्कृतिकर्मी चिकित्सालय पहुंच गए। कामतानाथ के परिवार में पत्नी शशिकांता, बेटा आलोक, तीन बेटियां रश्मि, इरा एवं चारू हैं। रात में उनके पार्थिव देह को अलीगंज स्थित घर ले जाया गया।
अन्तिम संस्कार आज ः कामतानाथ का अन्तिम संस्कार शनिवार को पूर्वाह्न 10 बजे बैकुण्ठधाम में होगा। शुक्रवार की रात उनका शव उनके अलीगंज स्थित आवास ले जाया गया।
यादों को दुरुस्त कराते खुद यादों में सिमट जानाः पिछले कई वर्षों से कामतानाथ अपनी पत्नी शशिकान्ता की यादों को दुरुस्त करने की कोशिश करते रहे और अचानक खुद भी यादों का हिस्सा बन गये। पत्नी की बीमारी को लेकर हमेशा चिन्तित रहने वाले कामतानाथ अचानक खुद इस तरह बीमार होकर कुछ ही महीनों में हमसे बिछड़ जाएंगे, इस पर विश्वास नहीं हो रहा। इसके बावजूद भी कि कुछ ही समय पहले उनके गंभीर रूप से कैंसर से पीड़ित होने की खबर से साहित्य जगत को चिन्तित कर दिया था। कामतानाथ इधर साहित्यिक गतिविधियों से दूर हो चले थे। अल्जाइमर से पीड़ित पत्नी की देखभाल के कारण उनका कहीं जाना नहीं हो पाता था। लेकिन वजह सिर्फ इतनी नहीं थी। वास्तव में साहित्य के समकालीन परिदृश्य को लेकर बहुत उत्साहित नहीं थे। कुछ समय पूर्व जब नगर में उनके 75 वर्ष होने का जश्न मना था और प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह आए थे, बातचीत में उन्होंने कहा था कि लेखकों में पहले भी मतभेद होते थे, वाद विवाद होते थे, लेकिन आज जैसी कटुता नहीं, एक दूसरे को ऊपर नीचे करने की आज जैसी राजनीति नहीं होती थी।
साहित्य जगत में रचना करते हुए कामतानाथ को 50 साल से अधिक हो चुके थे। 1961 में उनकी पहली कहानी आयी थी लेकिन वे आज के साहित्य को डिजाइनर साहित्य मानते थे। वह कहते थे कि पहले भी साहित्य में कई धाराएं थीं, जैनेन्द, इलाचन्द जोशी, अज्ञेय जैसे कथाकार मनोवैज्ञानिक कहानियां लिखते थे, दूसरी ओर प्रेमचंद, यशपाल जैसे कथाकार थे लेकिन शिल्प के महत्व के बावजूद ऐसा नहीं होता था कि कथ्य का लोप ही हो जाए। लेखन जमीन से जुड़ा हुआ था। वह कहते थे कि आजकल जीवन में जिस तरह सब कुछ डिजाइनर होता जा रहा है, डिजाइनर फैशन का बोलबाला है, साहित्य भी डिजाइनर हो गया है। वह यह भी मानते थे कि आजकल कोई आन्दोलन नहीं है, इसीलिए लेखन में भी विचार नहीं है। साहित्य के साथ ही कामतानाथ रंगमंच पर भी काफी लोकप्रिय थे। उनकी रचनाएं मंचन के काफी उपयुक्त मानी जाती हैं। इसकी एक वजह भी है। उन्हें रंगमंच की गहरी समझ थी। वह कानपुर में अभिव्यक्ति संस्था के संरक्षक थे। दूसरे उनकी रचनाएं संवाद प्रधान रही हैं। वह मानते थे कि कहानियों, उपन्यासों को वर्णात्मक होने की जगह संवाद प्रधान होनी चाहिए। पात्रों का चरित्र इसी के माध्यम से व्यक्त होता है।
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