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चांसलर से मेडल मिलने की बात ही अलग थी

Lucknow

Updated Thu, 06 Dec 2012 05:30 AM IST
लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय में वर्ष 2010-11 में सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी के रूप में चांसलर गोल्ड मेडल की हकदार बनीं एमबीए की छात्रा दोआ नकवी को चांसलर के हाथ से यह मेडल न मिलने का मलाल है। हालांकि वह यह भी जोड़ती हैं कि यह बीती बात हो गई है। मैं इससे ही बहुत खुश हूं कि मेरे विभाग ने मुझे बुलाकर यह मेडल प्रदान किया और मेरे दो साल की मेहनत से मुझे और विभाग दोनों को ही सम्मान मिला।
लविवि के व्यवसाय प्रशासन विभाग ने बुधवार को दोआ नकवी को इस उपलब्धि के लिए सम्मानित किया। शिया पीजी कॉलेज के प्राचार्य डॉ. एमएस नकवी की बेटी दोआ ने 40 वर्ष बाद विभाग का इतिहास दोहराया है। विभाग के अध्यक्ष प्रो. ए. चटर्जी के अनुसार इससे पहले 1972 में व्यवसाय प्रशासन के किसी छात्र को चांसलर मेडल मिला था। 80.15 फीसदी अंकों के साथ दोआ ने पिछले वर्ष एमबीए टॉप किया था, लेकिन दीक्षांत समारोह आयोजित न होने के चलते मेडल वितरित नहीं हो सके। दोआ इस समय यूजीसी के जूनियर रिसर्च फैलोशिप क्वालिफाई कर चुकी हैं और आगे आईआईएम जैसे संस्थान से शोध के लिए प्रयासरत हैं। दोआ कहती हैं कि एमबीए फाइनल ईयर में उन्हें एक इंटरनेशनल बैंक में कैंपस प्लेसमेंट के जरिए नौकरी भी मिली, लेकिन उनका लक्ष्य एकेडमिक्स था, इसलिए उन्होंने नौकरी जॉइन नहीं की। हालांकि बीएससी बायोलॉजी की छात्रा रही दोआ एमबीए करने की वजह इसकी बेहतर एंप्लायबिलिटी बताती हैं। लविवि में एमबीए में पिछले कुछ वर्षों में घटे दाखिलों पर उनका कहना है कि अधिकांश सरकारी नौकरियों के लिए योग्यता स्नातक है। इसलिए युवाओं का रुझान बदला है। दूसरी ओर, एमबीए में प्लेसमेंट के मौके भी कुछ घटे हैं। इसलिए भी दाखिले घटे हैं। हालांकि यह अस्थायी दौर है और जल्दी खत्म हो जाएगा। विभाग के शिक्षकों को अपनी सफलता का श्रेय देते हुए दोआ कहती हैं कि उन्होंने शिक्षकों के द्वारा पढ़ाए गए नोट्स एवं बताई गई रेफरेंस बुक पढ़कर ही पहले प्रयास में जेआरएफ क्वालिफाई किया था। विभागाध्यक्ष प्रो. ए. चटर्जी ने दोआ नकवी को चांसलर मेडल का सर्टिफिकेट प्रदान किया। इस दौरान डॉ. नीरज कुमार, डॉ. अजय प्रकाश आदि विभागीय शिक्षक मौजूद रहे।


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