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विकास की अहम कड़ी मंझोले शहर

Lucknow

Updated Sun, 02 Dec 2012 05:30 AM IST
लखनऊ। देश के महानगर इस समय बिजली, संसाधन, स्थान एवं वक्त जैसी बुनियादों जरूरतों के बड़े दबाव से जूझ रहे हैं। इसलिए अब तक बड़े शहरों के विकास पर ही केंद्रित रहे भारत को मंझोले एवं छोटे शहरों की ओर देखना होगा जिनके साथ विकास के मापकों पर सौतेला व्यवहार होता आया है। यह शहर इस समय करोड़पति एवं कंगाल का मिश्रण बने हुए हैं। ऐसे में विकास की कहानी आगे लिखने में भारत के द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी के शहर ही खास भूमिका निभाएंगे। आईआईएम लखनऊ में शनिवार को आयोजित संवित-2012 में विशेषज्ञों की चर्चा के दौरान यह निष्कर्ष निकलकर आए। संवित का विषय ‘इंडिया नेक्स्ट : नए बाजार एवं नए अवसर’ रखा गया था। चर्चा की शुरुआत करते हुए जीई कैपिटल इंडिया के अध्यक्ष एवं सीईओ अनीश शाह ने कहा कि आंकड़ों को बाहर फेंकिए एवं वास्तविक स्थिति का आंकलन करिए। हमें सही रणनीति तय करनी होगी जो आगे बढ़ने में मदद करेगी। हमें सोचना होगा कि क्या इनोवेशन की दिशा में बढ़ रहे हाथ बाधा मुक्त हैं? क्या हमारा दृष्टिकोण इस बात को लेकर स्पष्ट है कि हम किस व्यवसाय में हैं और आखिरी बात यह कि हमें निर्णय करना होगा कि कैसे हम बिजनेस में श्रेष्ठ वैल्यू दे सकने की स्थिति में है। नेशनल जूट बोर्ड के सचिव अत्री भट्टाचार्य ने कहा कि हमें समझना होगा कि सरकार कौन है। जवाब है- हम और आप। हमें अपना बाजार केवल इच्छाओं से भरे लोगों के लिए ही तैयार नहीं करना होगा बल्कि बाजार जरूरतमंद लोगों के हितों के बारे में भी सोचने के लायक हो। उन्होंने कहा कि हमें आधारभूत संसाधनों, सड़क, भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं आदि मूलभूत जरूरतों को पूरा करना नहीं भूलना होगा जो भारत के विकास की कहानी में सबसे बड़ी बाधा है। द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी शहरों में उपलब्धता एवं मांग के बीच के भारी अंतर ने बाजार के लिए काफी अवसर उपलब्ध कराए हैं। सवाल यह है कि हम कैसे सबसे आम विभाजक तत्व को भी एक मूल्यवान ग्राहक में बदलने में सक्षम होते हैं। एमएस कैपिटल एडवाइजर्स के प्रमुख इंद्रनिल देब ने निर्यात आधारित आर्थिक विकास से घटती निर्भरता एवं मंझोले तथा छोटे शहरों पर ध्यान केंद्रित किए जाने के ट्रेंड पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि पीने का पानी, यातायात एवं ऊर्जा यह तीन मूलभूत क्षेत्र है जिस पर खास तौर पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। उन्होंने द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी के शहरों में कानूनों के प्रवर्तन एवं कानूनी समझौतों में आ रही दिक्कतों को निवेश में बाधक बताते हुए कॉर्पोरेट सेक्टर को सलाह दी कि उन्हें शहर के स्थानीय लोगों एवं समूहों से भाषाई संबंधों के विकास पर खास तौर पर होमवर्क करना चाहिए। जिससे एक-दूसरे को समझने में आसानी हो।
स्कॉटिया बैंक के कंट्री हेड संजीव मित्तल ने बैंकों के द्वितीय श्रेणी के शहरों में निवेश के फायदे गिनाए। उन्होंने कहा कि कोई भी बड़ी फर्म या बैंक भारत में अपना पांव जमाना चाहते हैं तो उन्हें इस बाजार की जरूरतों को पूरा करने की दिशा में बढ़ना होगा। एमएस कैपिटल एडवाइजर्स के प्रमुख किशोर चक्रबर्ती ने कहा कि बड़े महानगर इस समय जिस दबाव में जूझ रहे हैं उसमें यह आश्चर्यजनक नहीं है कि निवेशक बेहतर अवसरों के लिए छोटे शहरों की ओर रुख करें। द्वितीय श्रेणी शहरों को करोड़पति एवं कंगालों का विविध मिश्रण बताते हुए चक्रबर्ती ने इन शहरों में बढ़ती उपभोग की प्रवृत्ति एवं यहां पनप रहे उपभोक्तावाद के नए युग की ओर भी इशारा किया।
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