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शिक्षाविद् कुलपति बनाने को फिर बदलेगा नियम!

Lucknow

Updated Thu, 29 Nov 2012 12:00 PM IST
प्रेम शंकर मिश्र
लखनऊ। विश्वविद्यालयों में शिक्षाविद कुलपति की नियुक्ति के लिए यूजीसी अपने नियम बदल सकता है। यूजीसी के चेयरमैन प्रो. वेदप्रकाश ने इस बाबत संकेत दिए हैं। उनका कहना है कि कुलपति की नियुक्ति में राज्यों की भागीदारी के लिए ही कुलपति से जुड़ा क्लास यूजीसी रेगुलेशन से हटाया गया था। नए नोटिफिकेशन में कुलपति की नियुक्ति से जुड़े बाकी बिन्दुओं को शामिल किया जाएगा। प्रो. वेदप्रकाश बुधवार को एक मीटिंग के सिलसिले में राजधानी आए थे।
प्रो. वेदप्रकाश ने कहा कि कुलपति की नियुक्ति के लिए बने पैनल का बदलाव राज्यों की मांग पर ही किया गया है। राज्य विश्वविद्यालय में कुलपतियों की नियुक्ति में उनकी भागीदारी नहीं है क्योंकि नीति निर्धारण से लेकर अनुदान तक में राज्य बड़ी भूमिका निभाते हैं। इस मांग को ध्यान में रखते हुए ही कुलपति की नियुक्ति पैनल में राज्यों के प्रतिनिधि रखने का निर्णय किया गया है। प्रो. वेदप्रकाश ने कहा कि कई राज्यों ने इस संदर्भ में यूजीसी को पत्र लिखा था। यूजीसी रेगुलेशन (मिनिमम क्वालीफिकेशंस फॉर अप्वाइंटमेंट ऑफ टीचर्स, अदर एकेडमिक स्टाफ इन यूनिवर्सिटीज एंड कॉलेजेज एंड अदर मेजर्स फॉर द मेंटेनेंस ऑफ स्टैंडर्ड्स इन हायर एजुकेशन) 2010 से क्लाज 7.3.0 को डिलीट करने का मतलब यह नहीं है कि यूजीसी विश्वविद्यालय गैर-एकेडमिक कुलपति में बिठाना चाहती है। इसमें बदलाव केवल यूजीसी प्रतिनिधि की जगह पैनल में राज्य का प्रतिनिधि रखने तक ही है।

गड़बड़ी रोकने के लिए ऑब्जेक्टिव किया गया नेट : एक सवाल के जवाब में यूजीसी चेयरमैन ने कहा कि हमने नेट को पूरी तरह से ऑब्जेक्टिव इसलिए बनाया ताकि मूल्यांकन में आ रहे अंतर को रोका जा सके। यह तर्क गलत है कि इसको ऑब्जेक्टिव बनाने से गुणवत्ता घटेगी। नेट देने वाले अभ्यर्थी का सब्जेक्टिव आधार पर मूल्यांकन पहले भी कई स्तर पर हो चुका होता है। नेट के दौरान समस्या यह आ रही थी कि मूल्यांकन के दौरान उत्तर को आंकने का शिक्षक का अलग-अलग नजरिया था। ऐसे में एक ही विषय में अलग-अलग परीक्षक की दिशा में नंबर में काफी अंतर आ रहे थे। इसलिए इसको ऑब्जेक्टिव बनाया गया है। नेट के दोबारा जारी 15 हजार रिजल्ट में गड़बड़ियों से इनकार करते हुए उन्होंने कहा कि पर्सेंटाइल के आधार पर रिजल्ट जारी किए गए हैं। इसलिए सोशल साइंस व ह्यमूनिटीज विषय के अंकों की तुलना नहीं हो सकती है।

एक वर्षीय एलएलएम से रुकेगा पलायन : एलएलएम की डिग्री को एक वर्ष बनाए जाने के फैसले पर प्रो. वेदप्रकाश का कहना था कि सामान्य तौर पर पीजी की डिग्री लेने में 17 वर्ष लगते हैं लेकिन एलएलएम की डिग्री में विद्यार्थी को 20 वर्ष खर्च करने होते हैं। इंटीग्रेटेड फाइव ईयर कोर्स हो तो 19 वर्ष में एलएलएम की डिग्री मिल जाती है। दूसरे विदेशों में यह एक वर्ष का पाठ्यक्रम है। ऐसे में अक्सर अच्छे छात्रों में विदेशी संस्थानों को लॉ की मास्टर डिग्री के लिए तरजीह देने की प्रवृत्ति देखी जाती थी। इसलिए इस कोर्स को एक वर्ष का किया गया है जिससे छात्रों का पलायन भी रुके और समय की भी बचत हो। हालांकि इन्हें वहीं लागू किया जा सकेगा जहां लीगल स्टडीज का पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट हो।
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