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छोटे-छोटे बच्चे, बड़े-बड़े सवाल

Lucknow

Updated Sun, 25 Nov 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। हम जब धरती पर नहीं होंगे तो क्या जीवन होगा, धरती धुरी पर घूमती क्यों है, हिम युग क्यों आते हैं, प्रकाश का भार नहीं होता तो वह ब्लैकहोल के गुरुत्वाकर्षण से क्यों आकर्षित होता है, सूर्य पर हमारा भार कैसे तौला जा सकता है...? शहर के विभिन्न स्कूलों के बच्चों के ऐसे ढेरों सवाल और एक-एक कर उनकी जिज्ञासा शांत करते जाने-माने वैज्ञानिक व शिक्षाविद् प्रो. यशपाल। कभी किसी को पास बुलाकर जवाब बताते तो कभी हंसी-हंसी में गुत्थियां सुलझाते। ‘अमर उजाला’ की ओर से विज्ञान और समाज को करीब लाने की शृंखला ‘संवाद’ में शनिवार को कुछ ऐसा ही यादगार नजारा दिखा। राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) के प्रेक्षागृह में आयोजित कार्यक्रम में प्रो. यशपाल स्कूली बच्चों से रूबरू हुए और उनके विज्ञान से जुड़े सवालों के जवाब दिए। सुबह 11 बजे शुरू हुआ यह सिलसिला दोपहर सवा दो बजे तक चलता रहा। पूरे सवा तीन घंटे में एक पल भी ऐसा नहीं आया जब शहर के छात्र-छात्राओं में देश के जाने-माने शिक्षाविद् से सवाल पूछने में कोई झिझक दिखी हो। बड़े-बड़े सवाल और बहुत सरल अंदाज में उनके जवाब। 86 वर्ष की उम्र में भी प्रो. यशपाल कभी खड़े होकर, कभी टेबल पर बैठकर और कभी बच्चों को करीब बुलाकर जवाब दे रहे थे। न सवाल खत्म हो रहे थे और जवाब। ‘आपका स्टेमिना जबरदस्त है...’ विद्यार्थियों के बीच से ही जब यह बात कही गई तो प्रो. यशपाल ने भी मुस्कुराकर कहा, ‘और सवाल पूछो’। आयोजन कर हर पक्ष ज्ञान से भरा रहा। औपचारिकता नहीं थी शायद इसीलिए विद्यार्थियों के लिए यह सत्र दोस्ताना रहा।
1. जब लाइट एक मीडियम से दूसरे मीडियम में जाती है तो उसकी दिशा में कुछ बदलाव होता है, लेकिन उसकी फ्रीक्वेंसी नहीं बदलती है, ऐसा क्यों?
- मोहम्मद अफजल खान, क्लास 12, राजकीय इंटर कॉलेज, निशातगंज
प्रो. यशपाल : स्रोत की वजह से। प्रकाश जिस स्रोत से आ रहा है, वहां जैसी फ्रीक्वेंसी होगी प्रकाश की फ्रीक्वेंसी पूरे समय वैसी ही रहेगी। फिर चाहे वह पानी में जाए या वैक्यूम से गुजरे, कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

2. पृथ्वी की मैग्नेटिक फील्ड का पैटर्न समझ नहीं आता, ये आखिर है क्या?
- ऋत्विका तिवारी, अवध कॉलिजिएट
प्रो. यशपाल : पृथ्वी का भीतरी हिस्सा इतना गर्म है, जितनी सूर्य की सतह भी नहीं है। गर्म तत्व हमेशा ठंडे तत्व की ओर जाते हैं, पृथ्वी पर भी गर्मी बाहर आती रहती है। लावा इसका उदाहरण है। गोंडवाना भी इसी से बना। यह गर्मी जब बाहर आ रही होती है तो एक करंट बनता है, जो दो दिशाओं में बंट कर उत्तर और दक्षिण ध्रुव बनाता है। यही करंट मैग्नेटिक फील्ड बनाता है। खास बात ये कि ये फील्ड का पैटर्न स्थायी नहीं है। इसी वजह से पृथ्वी के इतिहास में कई बार उत्तर ध्रुव दक्षिण और दक्षिण ध्रुव उत्तर में बदला है। ये बदलाव ग्लोबल वॉर्मिंग या पृथ्वी से कुछ टकराने पर हो सकता है।

3. कंपस एकदम सही नॉर्थ दिशा नहीं दिखाता है, थोड़ा टेढ़ा रहता है, ऐसा क्यों?
- कुंदन सिंह, क्लास 11 साइंस, एसकेडी एकेडमी, गोमतीनगर
प्रो. यशपाल : हमें यह समझना होगा कि ज्योग्राफिकल नॉर्थ और मैग्नेटिक नॉर्थ अलग-अलग हैं। इसी वजह से हम जिस ज्योग्राफिकल नॉर्थ को मैग्नेटिक कंपस से देखना चाहते हैं तो वह कुछ टेढ़ा दिखाता है।

4. हर लाख साल में आइस एज क्यों आता है?
- स्वर्ण सिंह, क्लास 11, डीपीएस इंदिरानगर
प्रो. यशपाल : करीब 5 अरब साल पहले पृथ्वी अस्तित्व में आई। इस दौरान यहां लगातार जलवायु और भौगोलिक बदलाव आते रहते हैं। जलवायु बदलावों के दौरान आइस एज होती है। इसके जरिए पृथ्वी पर बढ़ा तापमान नियंत्रण में आता है। हालांकि हमेशा ऐसा हो जरूरी नहीं है।

5. शुक्र ग्रह पूर्व से पश्चिम क्यों घूमता है, जबकि बाकी ग्रह पश्चिम से पूर्व की ओर घूमते हैं?
- आयुष, सेंट्रल एकेडमी
प्रो. यशपाल : आपको किसने बताया? (आयुष - मैंने कहीं पढ़ा था) इसकी कोई निश्चित अवधारणा नहीं है। हर ग्रह की अपनी खासियतें हैं, यह शुक्र की खासियत है।

6. हम पढ़ाई को आसान कैसे बनाएं?
- आदित्य श्रीवास्तव
प्रो. यशपाल : बच्चो... आप पढ़ाई के मायने याद करने से लेते हो। यहीं से समस्या शुरू होती है। आप समझिए कि कोई सब कुछ याद नहीं रख सकता। पढ़ाई को आसान बनाने का तरीका है कि चीजों को याद मत करो, उन्हें खुद करके देखो। याद करके इम्तिहान तो पास कर लोगे, लेकिन सीखना मुश्किल हो जाएगा।

7. जब हम कमरे को बंद कर देते हैं तो आवाज फिर भी बाहर क्यों आती है? क्या आवाज बनने के दौरान हमारी पैदा की हुई वाइब्रेशंस कभी खत्म होती है?
- आस्था खरे
प्रो. यशपाल : बहुत बढ़िया सवाल है। दरअसल, आवाज वाइब्रेशन से पैदा होती है और बंद कमरों में मौजूद छोटे-छोटे रास्ते तलाशकर बाहर आ जाती है। साउंडप्रूफ रूम अच्छे उदाहरण हैं, जहां आपकी आवाज बाहर न जाए, इसके लिए कोई खिड़की, दरवाजा, दरार, रोशनदान नहीं छोड़े जाते। हमारी आवाज से बनी वाइब्रेशंस वातावरण में लंबे समय तक रहती हैं, धीरे-धीरे इतनी कमजोर हो जाती हैं कि इन्हें सुनना संभव नहीं रह जाता, यानी खत्म मानिए।
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