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बीबीएयू की लापरवाही से डूबे 80 करोड़

Lucknow

Updated Sat, 17 Nov 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय प्रशासन की लापरवाही से करोड़ों रुपये के अनुदान से हाथ धोना पड़ा है। विवि को ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में विश्वविद्यालय को 168 करोड़ का अनुदान स्वीकृत किया था। जिसमें से मिले हुए 124 करोड़ में से अभी 36 करोड़ रुपये खर्च नहीं हो सके हैं। यह रकम अब विवि के हाथ से निकल चुकी है। वहीं दूसरी किश्त में मिलने वाले बाकी के 44 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद भी समाप्त हो चुकी है। कुल मिला कर इस लापरवाही से विवि को लगभग 80 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। लेकिन इस बारे में कोई भी अधिकारी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है।
बीबीएयू को ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 168 करोड़ 27 लाख रुपये का अनुदान स्वीकृत किया था। जिसमें से पहली किश्त में आयोग ने विवि को 124 करोड़ 24 लाख रुपये स्वीकृत किए गए थे। अनुदान में जनरल डेवलपमेंट ग्रांट के तहत 113 करोड़ 34 लाख और मर्ज्ड स्कीम व एमफिल-पीएचडी की फेलोशिप के तहत 5 करोड़ 50 लाख रुपये मिले थे। इसके साथ ही रेमीडियल कोचिंग क्लास के संचालन और विकास के लिए अतिरिक्त ग्रांट के रूप में 5 करोड़ 39 लाख रुपये दिए गए थे। इस अनुदान में 31 जुलाई तक जनरल डेवलपमेंट ग्रांट में 82 करोड़ 44 लाख, मर्ज्ड स्कीम में 1 करोड़ 73 लाख, फेलोशिप मद में 1 करोड़ 53 लाख और अतिरिक्त ग्रांट में से 5 करोड़ 19 लाख रुपये ही खर्च किए जा सके। 31 मार्च 2012 को योजना समाप्त होने के बाद आयोग ने विवि से खर्च का ब्योरा मांगा जो उसे नहीं मिला। विवि की मांग पर खर्च का हिसाब भेजने की तिथि बढ़ाकर 15 मई कर दी थी। इस डेडलाइन पर भी विवि हिसाब नहीं भेज सका। इसके बाद एक बार फिर आयोग ने 30 सितंबर तक हिसाब भेजने को कहा। वही तिथि भी बीत गई लेकिन यूजीसी को हिसाब नहीं मिला। तय समय पर हिसाब न भेज पाने के कारण विवि को दूसरी किश्त के 44 करोड़ रुपये मिलने की संभावना समाप्त हो गई।
विवि प्रशासन के अधिकारी अक्सर ही मंत्रालय और अन्य अनुदानिक संस्थाओं के समाने संसाधन और अनुदान में कमी का रोना रोते हैं और धन न मिलने पर संस्थाओं को दोषी ठहराते हैं। इसके बावजूद वह मिले हुए धन को भी खर्च नहीं कर पाते हैं। इस मामले में कुलपति के कार्यकाल बढ़ाने की प्रक्रिया की सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में की गई टिप्पणी गौर करने वाली है। जिसमें विवि की परफार्मेस ऑडिट रिपोर्ट में कामकाज के तरीकों पर लगाई गई आपत्तियां भी शामिल की गई थी। इतना ही नहीं ऑडिट विभाग की रिपोर्ट में कहा था कि विश्वविद्यालय में बिना उपभोग के बचा फंड 2006-07 से बढ़कर 2010-11 में 30.80 करोड़ हो गया। मौजूद धन खर्च न होने के बावजूद कुलपति ने 400 करोड़ रुपये के अतिरिक्त अनुदान की मांग कर दी और अनुदान आवंटित न होने पर यूजीसी एवं एमएचआरडी के अधिकारियों को दोषी ठहराते रहे। जबकि एमएचआरडी की रिपोर्ट में विवि प्रशासन द्वारा कराए गए कई निर्माण कार्यों पर कड़ी आपत्ति दर्ज की गई थी। विवि के जिम्मेदार ग्रांट की ज्यादातर रकम उपयोग करने की बात कहकर अपनी पीठ ठोंक रहे हैं लेकिन 36 करोड़ रुपये न खर्च कर पाने और हाथ से फिसले 44 करोड़ के बारे में बोलने को कोई भी तैयार नहीं है।
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