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150 सालों में धरती को हुआ सर्वाधिक नुकसान

Lucknow

Updated Fri, 16 Nov 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। इंसान ने धरती को बीते 150 सालों में सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। मानव गतिविधियों से इतना नुकसान बीते दो लाख वर्षों में भी नहीं हुआ। मौजूदा समय पर्यावरणीय दशाओं में बहुत तेजी से बदलाव हो रहा है। यह सब धरती पर मानव की गतिविधियों के बढ़ने की वजह से हुआ है। प्रकृति स्वयं अपनी बीमारी का इलाज करती है, लेकिन बढ़ते प्रदूषण ने उसकी इस क्षमता को कमजोर किया है। यह जानकारी फिजिकल रिसर्च लैबोरेटरी अहमदाबाद के प्रो. रंगास्वामी रमेश ने दी। वे बुधवार को बीरबल साहनी पुरावनस्पति अनुसंधान संस्थान के संस्थापक दिवस समारोह के अवसर पर आयोजित 58वें सर अल्बर्ट चार्ल्स सेवार्ड मेमोरियल लेक्चर को संबोधित कर रहे थे।
प्रो. रंगास्वामी रमेश ने वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड के बढ़ते स्तर पर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि सूर्य से जो रेडिएशन धरती पर आता है, धरती उतनी ही मात्रा में रेडिएशन उत्सर्जित भी करती है। इससे तापमान में न के बराबर बढ़ोतरी होती है, लेकिन कार्बन डाईऑक्साइड की बढ़ती मात्रा से ऐसा नहीं हो पा रहा है और तापमान में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।
धरती पर वनस्पति रहेगी तभी संभव होगा जीवन ः कार्यक्रम में बीरबल साहनी मेमोरियल लेक्चर के तहत जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रो. केजी सक्सेना ने वनस्पतियों को पर्यावरण के संरक्षण और सतत विकास के लिए जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि धरती पर वनस्पति रहेगी तो ही जीवन संभव होगा। इस अवसर पर एनबीआरआई के निदेशक डॉ. सीएस नौटियाल ने सभी वैज्ञानिक संस्थानों और विश्वविद्यालयों से एकजुट होकर काम करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि योजना आयोग पंचवर्षीय योजनाओं में परिणाम के आधार पर ही अनुदान की सिफारिश करता है। साथ आकर काम करने से सही परिणाम निकल सकेगा जिससे वैज्ञानिक शोधों में धन की कमी नहीं आएगी। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के शिक्षकों से भी साथ मिलकर शोध को बढ़ावा देने की बात भी कही। वहीं संस्थान के निदेशक डॉ. आरआर यादव ने बीरबल साहनी के जीवन और संस्थान के लिए किए गए उनके प्रयासों के बारे में बताया।
बढ़ते तापमान की वजह से तूफान बढ़े ः प्रो. रमेश ने कहा कि बीते 30 सालों का इतिहास पलटें तो तबाही मचाने वाले तूफानों की तादाद में बढ़ोतरी हुई है। यह बढ़ते तापमान की वजह से है। बढ़ते तापमान का एक और दुष्प्रभाव हम पर पड़ रहा है। देश में पानी से तबाही की समस्या बढ़ रही है। बिहार, असोम और मुंबई में लोग यह देख भी चुके हैं। भारत में पूरे साल भर का पानी महज कुछ ही महीनों में बरसता है। इस दर में और कमी आ रही है अगले 100 सालों में यह दर दिनों में तब्दील हो जाएगी। धीरे-धीरे पानी बरसने से जमीन में पानी रिचार्ज होता है, लेकिन कम समय में ज्यादा पानी बरसने से बाढ़ की स्थिति आ जाती है। समस्या का समाधान बताते हुए प्रो. रमेश ने कहा कि धरती को बचाने के लिए हमें अक्षय ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता बढ़ानी होगी। वहीं कार्बन का कम से कम उत्सर्जन करने वाले इंजन के विकास की जरूरत है। खेती के तौर-तरीकों में भी बदलाव के साथ ही रासायनिक खेती पर लगाम लगानी होगी। वेटलैंड का विकास और संरक्षण की पहल भी करनी होगी।
युग की भविष्यवाणी संभव नहीं ः प्रो. रमेश का कहना है कि हम किस युग में जा रहे हैं, इस समय इस बारे में किसी की भी भविष्यवाणी सटीक साबित नहीं हो सकती है। एक ओर जहां दुनिया भर में ग्लोबल वार्मिंग पर बहस हो रही है, धरती का तापमान बढ़ भी रहा है। वहीं दूसरी ओर दक्षिणी और उत्तरी ध्रुवों के तापमान में कमी दर्ज की जा रही है। ग्लेशियर बन रहे हैं और उनके पिघलने की दर भी धीमी हो रही है। अगले 50 सालों तक यह नहीं कहा जा सकता कि हम आईस एज की ओर जा रहे हैं या ग्लोबल वार्मिंग की ओर।
जीवन की रक्षा के लिए वेटलैंड जरूरी ः प्रो. रमेश ने नाइट्रोजन के बढ़ते स्तर पर भी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि धरती पर नाइट्रोजन गैस का घनत्व सबसे ज्यादा है। उसके बाद भी इसमें महज 0.03 प्रतिशत की बढ़ोतरी से काफी नुकसान हो रहा है। इसकी मात्रा में असंतुलन जीवन के लिए ठीक नहीं है। इस असंतुलन से दुनिया भर के समुद्रों की अम्लीयता बढ़ रही है। जिससे कार्बन डाईऑक्साइड का अवशोषण करने की क्षमता पर भी बुरा असर पड़ रहा है। समुद्री वनस्पतियां जो बायोलॉजिकल सिंक का काम करती हैं, उनकी तादाद घट रही है। इससे कार्बन डाईऑक्साइड का घनत्व भी वातावरण में बढ़ रहा है, जो ग्लोबल वार्मिंग का कारण है। नाइट्रोजन के असंतुलन को दूर करने के लिए वेटलैंड को बचाना जरूरी है। भारत में सुंदर वन जैसे कई और प्राकृतिक वेटलैंड हैं। इन पर और शोध करने की जरूरत है।
2050 तक 2 डिग्री बढ़ेगा तापमान ः पिछले 30 लाख सालों में धरती का तापमान महज 10 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा है। साल 2050 तक धरती के तापमान में करीब 2 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी होगी। इसका कारण भी हमारी गतिविधियां ही हैं।
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