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हर काल में साहित्य में रहे असहमति के स्वर

Lucknow

Updated Mon, 05 Nov 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। असहमति के स्वर, लोकतंत्र और कथा साहित्य पर चर्चा तथा सम्मान के लिए आयोजित हुआ कथाक्रम का दो दिवसीय आयोजन रविवार को कई सहमतियों, असहमतियों के बीच सपन्न हो गया। अगले साल तक के इंतजार के साथ ही, कुछ अच्छी यादों और कुछ चुभने वाले बातें भी पीछे छोड़ गया। कथा साहित्य के अब तक के प्राय: अपरिचित समाज को अपनी रचनाओं का विषय बनाने वाले कथाकार तेजिन्दर का समान आयोजकों और चयन समिति की व्यापक दृष्टि का परिचायक था, तो इस बार का समारोह हाल के वर्षों का सबसे कमजोर समारोह भी साबित हुआ। निमंत्रण पत्र के आधे से अधिक रचनाकारों की अनुपस्थिति और श्रोताओं की कमी समारोह में खलती रही। इन सबके बीच मैत्रेयी पुष्पा ने साहित्यकारों के लिए जिस भाषा का इस्तेमाल किया, वह तिलमिला देने वाला रहा। विडंबना यह कि समारोह के बाहर तो उसकी व्यापक चर्चा और भर्त्सना हुई लेकिन अपने भाषणों में किसी ने भी उसकी निंदा की जहमत नहीं उठायी। शायद कथाक्रम के मंच ने भी प्रतिरोध के लिए मुखर विरोध की जगह चुप्पी पर अधिक भरोसा किया।
रविवार को समारोह का समापन सत्र था। अध्यक्ष मंडल में शामिल वरिष्ठ आलोचक भारत भारद्वाज और वरिष्ठ कथाकार कमल कुमार दोनों ने माना कि असहमति के स्वर साहित्य का स्थायी भाव है। कमल कुमार का कहना था कि किसी भी काल का साहित्य रहा हो उसमें असहमति के स्वर रहे हैं, सत्ता का प्रतिरोध रहा है। भारत भारद्वाज ने कहा कि लेखक जब कलम उठाता है तो विरोध और विद्रोह में लिखता हैं। तभी प्रेमचंद को कलम का मजदूर या कलम का सिपाही कहा गया। उन्होंने कहा कि रचनाकार कलम उठाकर समाज में हस्तक्षेप करता है। स्वतंत्रता के बाद हरिशंकर परसाई ने एक लेखक के तौर पर समाज में सबसे ज्यादा हस्तक्षेप किया। उन्होंने कहा कि राजनीति के अपराधीकरण पर सबसे पहले न प्रगतिशीलों ने लिखा और न ही जनवादियों ने बल्कि मन्नू भंडारी ने महाभोज में इसे दर्ज किया।
वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने एक बार फिर हिन्दी और हिन्दी साहित्य की उपेक्षा का सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार लोक की असहमति के साथ लोकतंत्र चल रहा है। उसी प्रकार पाठकों के बिना हिन्दी साहित्य भी चल रहा है। उन्होंने कहा कि साठ करोड़ हिन्दी भाषियों के बावजूद हिन्दी की कोई भी पत्रिका 10-15 हजार से अधिक नहीं बिक पाती है। पहले दिन से शुरू हुए नीलकंठ उपन्यास की प्रशंसा व आलोचना को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि इसमें आदिवासियों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले ढेर सारे शब्दों की जानकारी मिलती है। लेकिन शनिवार को सहज महसूस न करने के कारण अचानक अपना वक्तव्य समाप्त कर देने वाले वरिष्ठ साहित्यकार रवींद्र वर्मा ने उनकी बातों का अपने अंदाज में खंडन किया। उन्होंने कहा कि बहुत लोकप्रिय होने से आलू बन जाने का खतरा भी होता है। वर्मा ने कहा कि कोई उपन्यास इस कारण महत्वपूर्ण नहीं हो जाता कि उसमें बहुत सारी जानकारियां हैं। वास्तव में ऐसी रचनाओं को पढ़ना पी.साईनाथ की किसी रिपोर्ट को पढ़ने जैसा ही लगता है।
समारोह में गिरीशचन्द सक्सेना ने कहा कि आज साहित्य बाजारवाद से प्रभावित है और संपर्कों के आधार पर आलोचनाएं लिखी जा रही हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी के प्रोफेसर राजकुमार ने कहा कि कथा साहित्य में लोकतांत्रिक असहमतियों की जितनी गुंजाइश है, उतनी और कहीं नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार विभांशु दिव्याल ने कहा कि हमने आजादी, समाजवाद, दलित उत्थान, स्त्रत्त्ी समानता का स्वप्न देखा था लेकिन ये स्वप्न अब विचलित करते हैं। उन्होंने कहा कि साहित्य का काम एक नया यूटोपिया खड़ा करना होना चाहिए। कथाकार हरिचरन प्रकाश का कहना था कि जीने के लिए, रचने के लिए स्वप्न का होना जरूरी है। पत्रकार व साहित्यकार राजेंद्र राव ने कहा कि साहित्य वे लोग रचते हैं जिनका परिवार उनसे असहमत होता है। प्रियदर्शन मालवीय ने कहा कि कहानी में असहमति के स्वर विकसित नहीं हो पाए हैं।
संगोष्ठी में बलवंत कौर ने कहा कि महिलाएं कहती हैं कि हमें इतिहास से वंचित किया गया है, इसलिए हम नया इतिहास लिखेंगी। युवा लेखिका सोनाली सिंह ने कहा कि समाज की बहुत सारी स्थितियां कथाकार से अपनी कहानी लिखने की मांग करती हैं। नीला प्रसाद ने कहा कि स्त्री स्वतंत्रता के नाम पर देह विमर्श का चलन जोरों पर है लेकिन दुख की बात है कि इनको लिखने वाली महिलाएं हैं। वैभव सिंह ने कहा कि लेखक का काम जमीनी लोकतंत्र के बारे में लिखना होना चाहिए क्योंकि ऊपरी लोकतंत्र तो मिलावट का लोकतंत्र है। उन्होंने कहा कि संघर्षशीलता ही लेखन की पहचान है। सुशील सिद्धार्थ के संचालन में चले सत्र में अशोक गुप्ता, शान्ति यादव ने भी विचार व्यक्त किए।
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