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मैत्रेयी पुष्पा ने दी साहित्यकारों को गाली

Lucknow

Updated Sun, 04 Nov 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। संगोष्ठी तो ‘असहमति के स्वर, लोकतंत्र और कथा साहित्य’ पर चर्चा के लिए आयोजित थी लेकिन कथाक्रम के पहले दिन साहित्य की अपनी असहमतियां भी खूब उजागर हुईं। वरिष्ठ लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने तो साहित्यकारों को गाली ही दे डाली। उन्होंने जब कहा कि साहित्य में ... लोग (वर्णसंकर को व्यक्त करने वाली गाली) हैं तो सभागार में सन्नाटा छा गया। कलावादी साहित्य, मार्क्सवाद, हिन्दू धर्मग्रन्थों की आलोचना और साहित्य में जातिवाद को लेकर भी वाद-विवाद हुआ। मैत्रेयी पुष्पा ने साहित्यकारों के दोहरे चरित्र का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वैसे तो वे बड़े प्रगतिशील और खुले विचारों के बनते हैं लेकिन मैंने उन्हें अपने बेटे-बेटियों को समझाते सुना है कि प्रेम विवाह तो करना मगर फलां फलां जाति से कभी मत करना। उन्होंने कहा कि स्त्रियों के साथ समाज में बुरा बर्ताव होता है लेकिन जब कोई महिला रचनाकार उसे उठाती है तो उस पर आरोप लगता है कि वह यौनिक भ्रष्टाचार फैला रही है। उन्होंने कहा कि असहमति के स्वर व्यक्त करने के अपने खतरे हैं। यह खतरा रहता है कि हमें कहीं चरित्रहीन ही न मान लिया जाए। मैत्रेयी ने कहा कि जब बहुत लोग विरोध में होते हैं तो कुछ लोग साथ भी होते हैं। मैं तो आशाओं में रहती हूं, नहीं तो मेरा लेखन कब का बंद हो गया होता। अखिलेश ने कहा कि बहुत सारे साहित्यकार मार्क्सवाद में विश्वास करते हैं लेकिन आज जब हम लोकतंत्र की बात कर रहे हैं तो हमें यह भी सोचना चाहिए कि मार्क्सवाद में लोकतंत्र की कितनी गुंजाइश थी। वीरेंद्र यादव ने साहित्य में जातिवाद का सवाल उठाते हुए कहा कि यह विचार करने की जरूरत है कि दलित मुद्दों को लेकर मुख्य धारा के लोगों द्वारा जो लिखा जा रहा था, वह धारा अचानक अवरुद्ध क्यों हो गई। उन्होंने कहा कि साहित्य में यह कहा जाने लगा कि सवर्णों ने जो लिखा वह दलित विरोधी है। सम्मानित हुए रचनाकार तेजिन्दर ने जब कलावादी, रूपवादी साहित्य के विरुद्ध लामबंद होने की बात की तो गोविंद मिश्र ने अपने वक्तव्य में जोर देकर कहा कि साहित्य भी अन्तत: कला ही है। समारोह में मुद्राराक्षस ने एक बार फिर हिन्दू धर्मग्रन्थों और हिन्दी पर प्रहार किया। उन्होंने कहा कि हिन्दी-हिन्दू साहित्य की भाषा है और हिन्दी का समग्र साहित्य इसी आस्था से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि रामचरित मानस में समानता, समता की बात नहीं है। लेकिन तेजिन्दर ने बाद में इस पर बातचीत में कहा कि ये पुरानी बातें हो चुकी हैं। उन्होंने कहा कि यह समय विवाद खड़े करने का नहीं बल्कि उन आदिवासियों, दलितों के साथ खड़े होने का है जो मानस में वंचित रह गए हैं। गोविंद मिश्र ने बातचीत में कहा कि जिन चौपाइयों, दोहों पर आपत्तियां उठती हैं वे तुलसी ने नहीं लिखीं बल्कि बाद में जोड़ी गयी हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय के कालीचरण स्नेही ने अपने वक्तव्य में कहा कि सभागार में मार्क्सवादी रचनाकार अधिक हैं जो धर्म को अफीम मानते हैं लेकिन मुद्राराक्षस जी के भाषण के समय वे सभी हिन्दू हुए जा रहे थे।
आधे से अधिक साहित्यकार नहीं आए ः कथाक्रम की निमंत्रण पत्र में दी गई साहित्यकारों की सूची में से आधे से अधिक समारोह में शरीक नहीं हुए। इनमें वे कई प्रसिद्ध साहित्यकार भी शामिल हैं जिनका नाम सूची के आरंभ में प्रमुखता से दिया गया है। गिरिराज किशोर, दूधनाथ सिंह, विभूति नारायण राय, राजेन्द्र राव, प्रियंवद, जयप्रकाश कर्दम, प्रभु जोशी, ज्ञान चतुर्वेदी, बलराम, दिनेश शुक्ला, कंवल भारती, जया जादवानी, सुभाष गताड़े, जितेन्द्र श्रीवास्तव, मनीषा कुलश्रेष्ठ, पंकज मित्र, अपूर्व जोशी, वैभव सिंह, प्रेम शशांक, अनुज समारोह में शामिल नहीं हुए।
नहीं बोल सके रवीन्द्र वर्मा ः समारोह में रवीन्द्र वर्मा अपना वक्तव्य नहीं दे सके। संगोष्ठी के प्रथम सत्र में जैसे ही उन्होंने शुरूआत की और ये कहा कि भौतिक विकास हुआ लेकिन आत्मिक विकास नहीं हुआ, उन्हें महसूस हुआ कि उनकी तबियत ठीक नहीं लग रही है। उन्होंने क्षमा मांगते हुए वक्तव्य वहीं समाप्त कर दिया।
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