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शाबासी कम, सवाल ज्यादा उठे

Lucknow

Updated Thu, 01 Nov 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मनोज कुमार मिश्र ने 2 नवंबर 2009 को जब कार्यभार संभाला था तो वादों और इरादों का दौर देखकर बहुत कुछ उम्मीदें बंधी थी। उन्होंने कहा था कि टकराऊंगा नहीं पढ़ाऊंगा। उनका कार्यकाल शुक्रवार को समाप्त हो रहा है। तीन वर्षों में कुलपति ने पहली बात पर ही अमल किया, लेकिन दूसरी से वास्ता नहीं रखा। हालांकि टकराहट से बचने की कोशिश में उनकी बहुत ऊर्जा अपने कारिंदों के कारनामों को छुपाने में ही बीत गई और भ्रष्टाचार एवं अनियमितता के खिलाफ एक मुखर प्रशासक का स्वरूप लविवि ढूंढता ही रह गया। यही वजह है कि प्रो. मिश्र के हिस्से शाबासी कम और सवाल अक्सर आए। प्रो. मिश्र के कार्यकाल संभालने के कुछ समय बाद ही विश्वविद्यालय को बीएड प्रवेश परीक्षा की जिम्मेदारी मिली। प्रवेश प्रक्रिया के दौरान छात्रों की फीस दबाने से लेकर पर्चा लीक होने तक का मसला उनके गले की फांस बना। फीस कन्फर्मेशन रसीद के चलते 4000 छात्रों का फंसा भविष्य लविवि को एक वर्ष तक अदालत में घसीटता रहा। कॉलेजों की संबद्धता के मामले में फर्जीवाड़े के बड़े खेल उजागर हुए। स्वतंत्र गर्ल्स डिग्री कॉलेज एवं एसजी कॉलेज को मानक के खिलाफ संबद्धता देने के दोषी अभी तक तय नहीं हो सके हैं। कुलपति ने छात्रों से ई-मेल एवं अन्य माध्यमों से संवाद बनाए रखने की बात भी कही थी, लेकिन जैसे-जैसे कार्यकाल आगे बढ़ा, छात्रों और कुलपति के बीच में दीवार बढ़ती गई। क्लास लेने की कुलपति की बात हकीकत का रूप नहीं ले सकी। नरेंद्र देव की जयंती के बहाने हालांकि जरूर एकाध बार छात्रों को कुलपति के भीतर छिपे शिक्षक से रूबरू होने का दुर्लभ मौका मिला। मूल्यांकन में गड़बड़ियों के मामले पर भी निर्णय क्षमता के अभाव के उदाहरण देखने को मिले जब हर दिन प्रशासन का बयान बदलता रहा और आखिर में कॉपियां दिखानी पड़ी। मौजूदा सत्र में प्रवेश प्रक्रिया ने लविवि की किरकिरी कराई तो निर्माण कार्यों के लगे दाग धोने में भी काफी मेहनत हुई। कार्यकाल के अंतिम चरण में कुलपति ने अपने फैसलों में जरूर कुछ दम दिखाना शुरू किया पर तब तक उनका वक्त पूरा हो चुका था। छात्रसंघ चुनाव की घोषणा एवं अराजक छात्रों के निष्कासन की कड़ी इससे जोड़ी जा सकती है।
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