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सवा करोड़ देकर भी खाली हाथ लविवि छात्र

Lucknow

Updated Tue, 23 Oct 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय पर इस समय ‘गुड़ खाएंगे पर गुलगुले से परहेज’ की कहावत पूरी तरह से चरितार्थ हो रही है। छात्रसंघ मद में छात्रों से फीस वसूली पर लविवि को कोई ऐतराज नहीं हैं, लेकिन छात्रसंघ चुनाव से परहेज है। हालांकि शासन के आदेश के बाद कवायद शुरू हुई, लेकिन अब यह अदालती पचड़े में हैं। सांस्कृतिक गतिविधियों के नाम पर छात्रों से वसूली अनिवार्य शुल्क का हिस्सा है, लेकिन परिसर में अगर छात्र गोष्ठी या परिचर्चा करने की कवायद शुरू करते हैं तो विवि प्रशासन को कानून व्यवस्था पर संकट नजर आने लगता है। ऐसे ही आधा दर्जन मदों में इस सत्र तक लविवि छात्रों से लगभग 1.25 करोड़ रुपये वसूल चुका है, लेकिन सुविधाएं नदारत हैं। खास बात यह है कि वर्षों से गतिविधियां ठप होने के बावजूद भी दो सत्र पहले लविवि ने इन मदों में फीस दोगुना तक बढ़ा दी है। लखनऊ विश्वविद्यालय में इस समय 22 हजार से अधिक छात्र पढ़ते हैं। उनसे छात्रसंघ के मद में 75 रुपये वसूले जाते हैं। इस तरह लविवि प्रतिवर्ष लगभग 17 लाख रुपये छात्रों से छात्रसंघ के नाम पर वसूल रहा है जबकि छात्रसंघ चुनाव पिछले छह सत्रों से बंद है। इस सत्र में शुरू हुई प्रक्रिया आगे बढ़ेगी या नहीं संशय हैं। इसके साथ ही डेलीगेसी, खेल, कल्चरल एक्टिविटी, पुअर स्टूडेंट फंड एवं एक्सीडेंट रिलीफ फंड आदि के नाम पर भी अलग-अलग राशि फीस में समाहित है। इन सभी मदों में लविवि को लगभग 1.25 करोड़ की आय होती है। छात्रों से विभिन्न सुविधाओं के नाम पर लिए गए यह पैसे शायद ही छात्रों की किसी सुविधा के काम आते हैं। विश्वविद्यालय में चार डेलीगेसी हैं, लेकिन कोई भी इस समय वर्किंग में नहीं है। हजरतगंज स्थित डेलीगेसी टेंट हाउस के समान रखने के काम आ रही है। फिलहाल विश्वविद्यालय के कब्जे से वह बाहर हो चुकी है। छात्र खेल की भी फीस भरते हैं, लेकिन पूरे सत्र में विश्वविद्यालय में किसी भी तरह की खेल प्रतिस्पर्द्धा नहीं होती। केवल टीम चयन तक ही खेल गतिविधियां सीमित हैं। उसमें भी अक्सर बाहर टीम भेजते समय प्रशासन धन की कमी का रोना शुरू कर देता है। जबकि इसके नाम पर वर्तमान सत्र तक प्रति छात्र 100 रुपये वसूले जा रहे हैं। सांस्कृतिक गतिविधियां भी परिसर में न के बराबर हैं और इक्का-दुक्का आयोजन होते हैं तो वह खास अवसरों एवं विभागों तक ही सीमित है। एक्सीडेंट रिलीफ फंड में शायद ही किसी छात्र को कभी सहायता मिली हो। हर छात्र इसके लिए 100 रुपये भरता है। गरीब छात्रों की मदद का दावा लविवि प्रशासन जरूर करता है, लेकिन जिन गिने-चुने छात्रों को मदद मिलती भी है वह इतनी कम होती है कि छात्र की समस्या हल नहीं होती। इन मदों में वसूली जा रही धनराशि का फायदा छात्रों तक पहुंचाया जा सके इसका कोई रोडमैप लविवि के पास नहीं है। बीच में कुलपति ने पुअर फंड से बैक पेपर-इंप्रूवमेंट की बढ़ी फीस के लिए छात्रों के मदद की बात कही थी लेकिन वह जुबानी ही रहा। अब जहां मुखिया की बातों में वजन नहीं है वहां मातहतों से जिम्मेदारी निभानी की उम्मीद बेमानी ही है।
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