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वर्ष 1911 से शुरू हुआ केजीएमयू का ऐतिहासिक सफर

Lucknow

Updated Fri, 12 Oct 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज की स्थापना का सपना सन 1870 में महाराजा विजयनगरम ने देखा था। उन्होंने मेडिकल कॉलेज की स्थापना के लिए तीन लाख रुपये दान देने का प्रस्ताव भी दिया था। लेकिन वित्तीय संसाधनों के अभाव में यह यूनाइटेड प्रोविंसन (उत्तर प्रदेश) सरकार ने यह प्रस्ताव पारित नहीं किया। इसके बाद सन 1905 में वेल्स के राजकुमार के भारत भ्रमण के समय जहांगीराबाद के राजा सर तसुदुक रसूल ने अयोध्या के राजा से आग्रह किया कि वह इस प्रकार के विद्यालय की स्थापना के लिए यूनाइटेड प्राविंसन के ले. गवर्नर सर जेम्स लाटूश से कहें कि वह भारत सरकार से मेडिकल कॉलेज की स्थापना की संस्तुति करे। इस बार कॉलेज की स्थापना की स्वीकृति तो मिल गई लेकिन यह शर्त रख दी गई कि यूपी की जनता से इसके लिए आठ लाख रुपये इकट्ठे कराए जाएं। इसके बाद 26 दिसंबर 1905 को इस मेडिकल कॉलेज की नींव रखी गई। भारत आने पर जार्ज पंचम अैर महारानी मेरी ने इसका औपचारिक रूप से शुभारंभ किया। उस समय सर जॉन प्रेसकाट हेवेट यूपी के ले. गवर्नर थे। भारतीय सिरेनिक शैली व नवाबी शहर की मीनारों की मिलीजुली शैली में अस्पताल की बिल्डिंग तैयार हुई। अक्टूबर 1911 से यहां 31 छात्रों का पहला बैच शुरू हुआ था। कर्नल डब्लू. सेल्बी मेडिकल कॉलेज के पहले प्रिंसिपल बने। वह सर्जरी के प्रोफेसर भी थे। पांच प्रोफेसर और दो लेक्चरर के साथ यहां पढ़ाई शुरू हुई। 1916 में यहां से डॉक्टरों का पहला बैच निकला। इसी वर्ष से प्रतिवर्ष सबसे उत्कृष्ट छात्र को हेवेट पदक दिए जाने की शुरुआत हुई थी। 1914 में यहां पहला अस्पताल खुला जो किंग जार्ज हॉस्पिटल के नाम से जाना गया। 1921 में मेडिकल कॉलेज के प्रशासनिक अधिकार लखनऊ विश्वविद्यालय को दे दिए गए। इसी के बाद मेडिकल कॉलेज का पहला दीक्षांत समारोह 30 अक्तूबर 1921 को आयोजित किया गया। 1949 में दंत संकाय की शुरुआत की गई। 16 सितंबर 2002 को किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज को छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय बना दिया गया। यहां के प्रिंसिपल प्रो. केएम सिंह चिविवि के कुलपति बन गए। इसके बाद 12 मई 2003 को पद्मश्री डॉ. महेंद्र भंडारी को यहां का कुलपति बनाया गया।
चिकित्सा विवि का नाम बदलने की शुरुआत 2002 में हुई थी। तब बसपा सरकार ने 16 सितंबर 2002 को एक्ट के माध्यम से किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज का नाम बदल कर बदलकर छत्रपति शाहूजी महाराज के नाम पर किया था और चिकित्सा विश्वविद्यालय का दर्जा दिया था। उस समय से उत्तर भारत का पहला चिकित्सा विश्वविद्यालय बना था। दिसंबर 2003 में किंग जार्ज एलुमनाई एसोसिएशन की मांग पर समाजवादी पार्टी की सरकार ने छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय को किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय कर दिया था। 2007 में दोबारा बसपा सरकार बनने पर इसका नाम बदल कर छत्रपति शाहूजी के नाम पर कर दिया गया। पांच साल तक बसपा सरकार रहने पर इसका नाम चलता रहा। लेकिन मई 2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद एक बार फिर चिविवि का नाम किंग जार्ज के नाम पर रखने की मांग ने जोर पकड़ लिया था। इस बारे में बाकायदा टीचर्स एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर चिविवि का नाम बदलने की मांग की थी। आखिरकार जार्जियंस की मांग रंग लाई और 23 जुलाई 2012 को कैबिनेट बैठक में चिविवि का नाम एक बार फिर किंग जार्ज के नाम पर करने की मुहर लग गई।
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