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ट्रॉमा के दो गार्डों को खून बेचते दबोचा

Lucknow

Updated Wed, 10 Oct 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। शहर में खून के काले कारोबार की परतें हर दिन खुल रही हैं, लेकिन लापरवाह अस्पताल व पुलिस प्रशासन की मिलीभगत से आरोपियों को बिना किसी कार्रवाई के छोड़ दिया जाता है। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) में मरीज की मजबूरी का फायदा उठाकर 12 हजार रुपये लेकर खून देने वाले ट्रॉमा के दो गार्डों को मंगलवार सुबह ब्लड बैंक कर्मचारियों ने दबोच कर पुलिस के हवाले कर दिया। बाद में पुलिस ने दोनों गार्डों से साठगांठ करके उन्हें छोड़ दिया। अब पुलिस व अस्पताल प्रशासन इस मामले को दबाने में लगे हैं।
केजीएमयू के चाइल्ड वार्ड में भर्ती मरीज को खून की आवश्यकता थी। काफी प्रयास के बाद भी खून की व्यवस्था नहीं होने से परिजन परेशान थे। इसे देख ट्रॉमा में तैनात गार्ड फैजान ने 12 हजार रुपये लेकर दो यूनिट खून देने की बात कही। मरीज के परिजनों ने उसे पांच हजार रुपये दिए और बाकी रकम खून मिलने के बाद देने को कहा। इसके बाद फैजान ने ट्रॉमा में तैनात एक अन्य गार्ड चंद्रभान को फोन करके बुलाया। दोनों गार्ड खून देने के लिए तड़के 4:30 बजे चिविवि के ब्लड बैंक पहुंचे तो वहां डोनर फॉर्म भरवाते समय कर्मचारियों को उन पर शक हुआ। उन्होंने सख्ती से पूछताछ की तो घबराए फैजान ने भागने का प्रयास किया। कर्मचारियों ने पीछा करके उसे दबोच लिया। कड़ाई से पूछताछ में चंद्रभान और फैजान ने खुद को ट्रॉमा का गार्ड बताया। इस पर ट्रॉमा प्रशासन से संपर्क किया गया। पुलिस को सूचना देने के बाद दोनों गार्डों को ट्रॉमा पीआरओ के हवाले कर दिया गया। मौके पर पहुंचे पुलिसकर्मियों ने गार्डों को कस्टडी में ले लिया। सुबह पकड़े गए गार्डों को पुलिस ने एक घंटे तक चौकी में बैठाए रखा, उसके बाद साठगांठ करके बिना किसी कार्रवाई के छोड़ दिया। मामला प्रकाश में आने के बाद पुलिस गार्डों को मददगार बताने लगी।
पुलिस व अस्पताल प्रशासन की मिलीभगत आई सामने
केजीएमयू में हुई इस घटना के बाद यह बात साफ हो गई कि अस्पताल प्रशासन और पुलिस के गठजोड़ से खून का काला कारोबार चल रहा है। इसे रोकने के बजाय पुलिस व अस्पताल प्रशासन मामले को दबाने में लगे हैं। पुलिस व अस्पताल प्रशासन पहले घटना को नकार रहे थे। मामला तूल पकड़ने के बाद अस्पताल प्रशासन शिकायत आने पर कार्रवाई की बात कहते हुए मामला रफा-दफा करने में लग गया। मेडिकल कॉलेज चौकी इंचार्ज तो पहले घटना को स्वीकारने से ही मना कर रहे थे। बाद में चिविवि प्रशासन पर कार्रवाई का ठीकरा फोड़ने लगे।
पहले भी दबाई गईं घटनाएं
दस दिन पहले ट्रॉमा के गार्ड ने सीतापुर की मरीज लक्ष्मी से तीन हजार रुपये में खून का सौदा किया था। उस गार्ड पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसी तरह सात माह पहले खून के एक कारोबारी को तत्कालीन मेडिकल चौकी इंचार्ज धर्मवीर ने छोड़ दिया था। इससे दो माह पहले खून के चार कारोबारियों को मेडिकल कॉलेज से पकड़ कर तत्कालीन चौक इंस्पेक्टर नरेंद्र सिंह राणा ने जेल भेजा था। इन आरोपियों ने कई अहम खुलासे किए थे, लेकिन उनकी तफ्तीश कागजों में दफन हो गई।
वहीं केजीएमयू के चिकित्सा अधीक्षक नरसिंह वर्मा ने कहा कि ट्रॉमा के गार्ड इस तरह के गलत कामों में लिप्त हैं। सूचना मिली थी कि ट्रॉमा के दो गार्डों को खून देने से पहले ब्लड बैंक कर्मचारियों ने पकड़ा है। दोनों को पुलिस के हवाले कर दिया गया है। मरीज के परिजन यदि शिकायत करते हैं तो गार्डों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई जाएगी। ब्लड बैंक में बहुत सख्ती है, किसी भी हाल में खून का कारोबार करना संभव नहीं है। दूसरी ओर मेडिकल कॉलेज चौकी इंचार्ज सुनील कुमार सिंह ने कहा कि सुबह मामले की जानकारी मिली थी, गार्डों से पूछताछ की गई। उसके बाद गार्ड कहां गए, इसकी जानकारी नहीं है। चिविवि यदि कोई तहरीर देता तो उस आधार पर इनके खिलाफ कार्रवाई की जाती। हमें कोई तहरीर नहीं दी गई। गार्डों के नाम व उनसे संबंधित कोई जानकारी हमारे पास नहीं है।
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