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हर काल खंड में निखरती रही लखनऊ की सुंदरता

Lucknow

Updated Thu, 27 Sep 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। पिछले ढाई सौ वर्षों में बंटे चार काल खंडों में अपने लखनऊ ने मौजूदा स्वरूप पाया। ये समय, यहां शासन में काबिज रहीं शक्तियों को बेहद सुंदरता से प्रतिबिंबित करता है। बुधवार को वॉल्टर बर्ले ग्रिफिन की स्मृति में पर्यटन भवन में आयोजित एक सेमिनार में शहर के आर्किटेक्ट्स ने यह जानकारी दी। जीबीटीयू के वास्तुशास्त्र संकाय की ओर से आयोजित इस सेमिनार में ऑस्ट्रेलियाई इतिहासकार डॉ. डेविड हेडन और आर्किटेक्ट प्रो. क्रिस्टोफर वर्नन के भाषण बेहद यादगार रहे। विद्वानों को सुनने के लिए आए विद्यार्थियों और अतिथियों की मौजूदगी से पूरा सभागार खचाखच भरा रहा और बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने खड़े रह कर लेक्चर्स से ज्ञान लिया। शुरुआत अतिथियों के स्वागत से हुई। जीबीटीयू के वीसी प्रो. आरके खांडल ने सेमिनार के उद्देश्य पर भाषण दिया और प्रो. जगबीर ने वास्तुशास्त्र के महत्व को अपने भाषण में समझाया। डॉ. डेविड हेडन ने वॉल्टर ग्रिफिन के कैनबरा व लखनऊ के प्रति पैशन के बारे में बताया और उनके योगदान को अविस्मरणीय बताया। सुशील गुप्ता, हिमांशु सोनी और रजतकांत ने मिलकर ‘लखनऊ : द डांस ऑफ रिवर एंड गार्डन’ प्रजेंटेशन प्रस्तुत किया। रवि कपूर ने भी तस्वीरों के जरिए लखनऊ की कहानी बयां की। ला-मार्टीनियर स्कूल की प्रिंसीपल फरीदा अब्राहम, सामाजिक कार्यकर्ता चंद्र प्रकाश, शिक्षाविद् डॉ. अमृता दास, टीसीएस के प्रिंसीपल कंसल्टेंट जयंत कृष्णा और माधवी कुकरेजा ने ‘लखनऊ : पास्ट, प्रजेंट एंड फ्यूचर’ चर्चा प्रस्तुत की।
ऑस्ट्रेलिया के लिए 100 साल माने ‘प्राचीन’ : प्रो. किस्टोफर वर्नन ने ग्रिफिन के कार्यों का खाका अपनी प्रजेंटेशन के जरिए खींचा और उनकी पूरी कहानी बताई। उन्हाेंने भारतीयों विशेषकर लखनऊवासियों को सौभाग्यशाली बताया, क्योंकि यहां हजार-हजार साल पुरानी इमारतें भी देख पाते हैं। यह समृद्ध इतिहास की निशानी है। ऑस्ट्रेलिया में 100 साल पुरानी इमारत को प्राचीन की श्रेणी में रखकर विशेष तवज्जो दी जाती है। वहीं लखनऊ में 200 साल पुराने मकानों में भी लोग रह रहे हैं। उन्हाेंने इनके संरक्षण को एक बेहद सभ्य समाज का प्रमुख दायित्व बताया। उन्होंने ग्रिफिन द्वारा अधूरे रह गए कामों को बेहद रूमानी अंदाज में प्रस्तुत किया। भाटिया हाउस को ग्रिफिन द्वारा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और एशिया में बनवाए सभी घरों में श्रेष्ठ बताया। प्रो. वर्नन ने लखनऊ विश्वविद्यालय में लाइब्रेरी के सामने मौजूद संरचना के ग्रिफिन की स्मृति में बने स्मारक होने की संभावना बताई।

250 साल औैर लखनऊ : जीबीटीयू के वास्तुकला संकाय के रविकांत ने ‘लखनऊ : द डांस ऑफ रिवर एंड गार्डन’ में बताया कि किस तरह आधुनिक लखनऊ विभिन्न काल खंडों से गुजरकर आज के स्वरूप में आया। उन्होंने कहा कि इसमें आज भी विकास और आधुनिकीकरण का दौर चल रहा है, जो एक अनवरत प्रक्रिया है।

पहला खण्ड - नवाबी दौर जब विकसित हुआ चौक : 1754 से 1856 की इस अवधि में लखनऊ में इमामबाड़े जैसी इमारतें, सिंकदरबाग जैसे बागीचे, लोहे और पत्थर के गोमती पुल आदि बने, जिनपर आज भी शहर के लोग नाज करते हैं। वहीं, सआदतगंज, मंसूर नगर बसाए गए। 1785 में नवाबों द्वारा फैजाबाद से राजधानी लखनऊ ले आना शहर के लिए प्रमुख योगदान रहा। हालांकि तब ही बनी हैदर नहर आज नाला बन चुकी है।

दूसरा खण्ड - कॉलोनियल पीरियड में बनी कैंटोनमेंट : लखनऊ के विकास का यह खंड अंग्रेजों के प्रभाव में रहा। उन्हाेंने यहां विस्तृत सर्वे करवाए, चौड़ी सड़कें बनीं। 1858 में कर्बला के रूट और कर्बला शिफ्ट
हुए। 1862 को रेल मिली, कई बागों को छोटा कर वहां संस्थानों का निर्माण किया गया।

तीसरा खण्ड - आजादी के बाद बना महानगर : यह दौर महानगर के विकास का रहा। वहीं 1950 और 72 की बाढ़ ने लखनऊ के नियोजकों को गोमती के किनारों को पुख्ता करने का महत्व समझाया ताकि शहर का स्थायी विकास हो सके। 1962 के मास्टर प्लान में ही तय हुआ कि लखनऊ का 8.2 प्रतिशत से अधिक हिस्सा औद्योगिकीकरण के लिए नहीं दिया जाएगा।

चौथा खण्ड - हमारा समकालीन समय : आधुनिक समय में गोमतीनगर बसा और लखनऊ ने तेजी से प्रसार पाया। खास बात यह भी रही कि अब तक गोमती के बाढ़ प्रभावित गिने जाने वाले क्षेत्रों में शहर ने प्रसार पाया। प्रसार इतना तेज रहा है कि 10 साल पहले तक जो क्षेत्र लखनऊ से बाहर गिने जाते थे, आज केंद्र में आ गए हैं।
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