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बाल अदालत दिलाएगी बच्चों को न्याय

Lucknow

Updated Sat, 22 Sep 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। स्कूलों में बढ़ती कार्पोरल पनिशमेंट यानी शारीरिक दंड की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए बाल अदालत का सहारा लिया जाएगा। जिला विद्यालय निरीक्षक स्तर पर शुरू होने वाली इन बाल अदालतों में बच्चों की तमाम शिकायतों को रखा जाएगा, जिनका जल्द से जल्द निस्तारण किया जाएगा। साथ ही विभिन्न विद्यालयों से प्राप्त शिकायतों और प्रबंधन द्वारा उसके निस्तारण पर भी निगरानी रखेगी। वर्ष 2007 में स्कूलों में शारीरिक दंड पर प्रतिबंध विषयक शासनादेश के आधार पर इनकी स्थापना की जा रही है। अमर उजाला’ ने 21 सितंबर के अंक में ‘जिम्मेदार ही नहीं चाहते स्कूलों में शारीरिक दंड रोकना’ शीर्षक से मुद्दे को उठाया गया था। इसके बाद हरकत में आए जिला विद्यालय निरीक्षक उमेश त्रिपाठी ने जल्द ही जिला स्तर पर बाल अदालत की शुरुआत करने की घोषणा की है। उन्होंने बताया कि बाल अदालत की बैठक एक माह में दो दिन होगी। इनके आयोजन के स्थान का निर्धारण शिकायतों की संख्या के आधार पर किया जाएगा। जहां से अधिक शिकायतें आएगी, वही बाल अदालत का आयोजन किया जाएगा। बाल अदालत में डीआईओएस के अलावा राजकीय विद्यालयों के चार वरिष्ठ प्रधानाचार्य व शिक्षक बच्चों की शिकायतों को सुनेंगे। अदालत में संबंध विद्यालयों के प्रतिनिधियों का होना भी आवश्यक होगा। गौरतलब है कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अगस्त 2007 के पत्र के आधार पर पूर्व मुख्य सचिव प्रशांत कुमार मिश्र ने स्कूलों में शारीरिक दंड पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश जारी किए थे। वहीं, शिक्षा विभाग को भी बच्चों की शिकायतों और उनके निस्तारण को लेकर विद्यालय स्तर पर की गई कार्रवाई की समीक्षा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसके लिए विभागीय स्तर पर ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर पर विशेष निगरानी समितियों को गठन किया जाना था, लेकिन पांच साल बाद भी यह समितियां अस्तित्व में नहीं आ सकी।
सभी स्कूलों में लगेंगी शिकायत पेटी ः लखनऊ। स्कूलों में शारीरिक दंड को रोकने के लिए राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के निर्देशों के तत्काल प्रभाव से लागू किए जाने के आदेश जारी कर दिए गए हैं। डीआईओएस उमेश त्रिपाठी ने बताया कि सभी स्कूल प्रबंधनों को प्रचार-प्रसार के माध्यम से शारीरिक दंड नहीं दिए जाने की सूचना देनी होगी। इसके अलावा, प्रत्येक स्कूल में एक ऐसा फोरम का गठन किया जाएगा, जहां बच्चे अपनी बात रख सकें। प्रत्येक स्कूल को अनिवार्य रूप से शिकायत पेटिका लगानी होगी। इन पर निगरानी की जिम्मेदारी अभिभावक-शिक्षक समिति को सौंपी गई है। वहीं, जिला स्तर पर बाल अदालत के माध्यम से इन पर निगरानी रखी जाएगी।
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