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हमारी खाक पर भी रो गया है...

Lucknow

Updated Fri, 21 Sep 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। प्रख्यात शायर मीर तकी मीर की गजल का शेर - इधर से अब्र उठकर जो गया है, हमारी खाक पर भी रो गया है, सरहाने मीर के कोई न बोलो, अभी टुक रोते-रोते सो गया है... लखनऊ में उनकी स्मृतियों पर सटीक बैठते हैं। उनकी शायरी तो देश-दुनिया में चर्चा का केन्द्र बनती है, शिक्षा संस्थानों में पढ़ाई जाती है, संगीतकारों के संगीत से सजती है और लोगों की बातचीत में मुहावरे की तरह इस्तेमाल होती है। लेकिन उस शहर में जहां उन्होंने अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण वर्ष बिताए और जहां उनका निधन हुआ, उनकी स्मृति को ढंग से सहेजा नहीं जा सका। उर्दू को सिर माथे बैठाने वाले इस शहर के लिए मीर की ही पंक्ति उद्धृत की जा सकती है- अफसोस तुमको मीर से सुहबत नहीं रही। लखनऊ जो हिंदी के विख्यात साहित्यकारों का नगर रहा है वहीं उर्दू के प्रसिद्ध रचनाकार की जन्मभूमि या कर्मभूमि भी रहा है। हिंदी और और उर्दू के साहित्यकार इस नगर के साहित्यिक परिदृश्य के ताने-बाने की तरह हैं। जिन प्रसिद्ध शायरों ने लखनऊ में काफी समय बिताया उनमें सौदा, इंशा, आतिश, नासिख, अमीर मिनाई से लेकर जोश, मोहानी, मजाज, नूर तक एक लंबी और समृद्ध परंपरा है। मीर तकी मीर का जन्म लखनऊ में नहीं हुआ था। वे आगरा में 1723 के सितंबर की किसी तारीख को जन्मे थे। आगरा से वे दिल्ली आ गए थे। उनके पिता मीर मुहम्मद अली थे जो बाद में सूफी हो गए थे। दीवाने मीर के पॉकेट बुक्स संस्करण का संपादन करने वाले नंद किशोर आचार्य ने लिखा है कि अमहद शाह अब्दाली के दिल्ली पर हमले, लूटमार और बाद में राजा नागरमल की मृत्यु के बाद 1780-81 के बाद मीर लखनऊ चले गए। पहली पत्नी की मृत्यु के बाद 1783-84 में उन्होंने दूसरी शादी की। 20 सितंबर 1810 को उनका देहांत हो गया। मीर से गहरे तक प्रभावित माने जाने वाले फिराक गोरखपुरी ने भी एक जगह लिखा है कि वे रकाबगंज लखनऊ की खिन्नी वाली गली में रहते थे। सन 1810 में मीर का इंतकाल हुआ और वे लखनऊ के सिटी स्टेशन के करीब अखाड़ा भीम में दफन हैं। मीर जहां दफन थे वह स्थान अब कहीं अतिक्रमण में गुम हो चुका है। बताते हैं कि सिटी स्टेशन बनने के बाद भी यह स्थान कई सालों तक दिखता था। बाद में उनकी स्मृति की चिंता हुई तो सिटी स्टेशन के पास ही एक छोटा पार्क बनवाया गया और इसमें पत्थर की कलम, किताब और दवात बनवाकर इसे निशान-ए-मीर का नाम दिया गया। यहां से सुभाष मार्ग से मिलने वाली सड़क को मीर तकी मीर मार्ग का नाम दिया गया। लेकिन यह अपने रचनाकारों के प्रति कृतघ्नता है कि जहां पार्क में अतिक्रमण और गंदगी रहती है वहीं कलम, किताब और दवात गायब हो चुकी है।
मीर के कुछ प्रसिद्ध शेर

उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आखिर काम तमाम किया

राहे-दूरे-इश्क में रोता है क्या
आगे-आगे देखिए होता है क्या
-----
यारों मुझे मुआफ रखो मैं नशे में हूं
अब दो तो जाम खाली ही दो मैं नशे में हूं
-----
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग तो सारा जाने है
-----
देख तो दिल कि जां से उठता है
ये धुआं सा कहां से उठता है
यूं उठे आह उस गली से हम
जैसे कोई जहां से उठता है
-----
फकीराना आए सदा कर चले
मियां खुश रहो हम दुआ कर चले
----
मीर के दीनो-मजहब को अब पूछते क्या हो उन ने तो
कश्का खेंचा दैर में बैठा, कब का तर्क इस्लाम किया
कश्का (तिलक), खेंचा दैर (मंदिर), तर्क (त्यागना)
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