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स्कूली बच्चों को नहीं मिली शारीरिक दंड से मुक्ति

Lucknow

Updated Thu, 20 Sep 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। स्कूलों में कार्पोरल पनिशमेंट यानी बच्चों को दी जाने वाली शारीरिक दंड की घटनाएं रोकने के लिए शिक्षा विभाग द्वारा लंबी कवायद की गई। सुप्रीम कोर्ट से लेकर प्रदेश सरकार की ओर से कई बार निर्देश भी जारी किए गए। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के निर्देशों के तहत राजधानी के प्रधानाचार्यों व शिक्षकों की कार्यशालाएं आयोजित कर बार-बार कार्पोरल पनिशमेंट को बंद करने की अपील की गई, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। नेशनल पब्लिक स्कूल की नौवीं की छात्रा सीमा गुप्ता की शिक्षक राहुल मिश्र की पिटाई से हुई मौत और महाराजा अग्रसेन हाईस्कूल स्कूल में बच्चों को मारपीट कर नाम काटने के मामले इसका ताजा उदाहरण है। कार्पोरल पनिशमेंट पर रोकने के लिए की कई कवायदों का कोई भी असर राजधानी के विद्यालयों में नहीं हो रहा है। जिला बाल अधिकार समिति के डॉ. अंशुमाली शर्मा कहते हैं कि विद्यालयों में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की खुल कर अवहेलना की जा रही है। समिति के सदस्यों ने बीते दिनों राजधानी के 200 से ज्यादा विद्यालयों का जायजा लिया है, लेकिन इनमें से एक भी विद्यालय में शिकायत पेटिका देखने को नहीं मिली। केवल इतना ही नहीं, अभिभावक-शिक्षक समिति के निष्क्रिय होने के कारण तमाम शिकायतों के कभी सामने ही न आने की भी पुष्टि की गई है।
क्या है का कार्पोरल पनिशमेंट : कार्पोरल पनिशमेंट या शारीरिक दंड की श्रेणी में सिर्फ बच्चों के साथ मारपीट ही नहीं सभी अन्य प्रकार के दंडों को शामिल किया गया है। राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग की परिभाषा के तहत शारीरिक दंड, मानसिक दंड, सेक्सुअल दंड और नकारात्मक दंड शामिल हैं। बाल संरक्षण समिति के डॉ. अंशुमालि शर्मा बताते हैं कि शारीरिक दंड में मारना-पीटना आता है जबकि मानसिक दंड बच्चों को बुद्धू, गधा या फिर बेवकूफ आदि शब्द इस्तेमाल करके डांटना शामिल हैं। सेक्सुअल दंड में उनके साथ गलत बातें करना और नकारात्मक दंड में उनकी बातों को न सुनना आता है।

क्या है प्रावधान : सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2000 में स्कूलों में कार्पोरल पनिशमेंट या शारीरिक दंड पर पूरी तरह से रोक लगा दी थी। इसे लागू करने के लिए नौ अगस्त 2007 को राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने प्रदेश के मुख्य सचिव को पत्र लिखा था। 09 अक्टूबर 2007 के आदेश मुख्य सचिव प्रशांत कुमार मिश्र ने कार्पोरल पनिशमेंट पूरी तरह से प्रतिबंधित करने के साथ ही शिक्षा विभाग को इसे लागू कराने के निर्देश दिए थे। वहीं, 2010 में केन्द्र सरकार की ओर से लाए गए शिक्षा का अधिकार अधिनियम में भी किसी भी प्रकार के शारीरिक और मानसिक दंड पर रोक लगा दी गई है। बावजूद, शारीरिक या मानसिक दंड देने की स्थिति में शिक्षक और विद्यालय के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान भी है। इसमें शिक्षक के खिलाफ एक से तीन वर्ष का कारावास और कम से कम 50,000 रुपये के जुर्माने का प्रावधान है। इसके अलावा भारतीय दंड संहिता में भी कठोर कार्रवाई का प्रावधान हैं।

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