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शरीर पर ऑटो इम्यून डिजीज का भी हमला

Lucknow

Updated Sun, 16 Sep 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। ऑटो इम्यून डिजीज का खतरा शरीर के विभिन्न अंगों पर मंडरा रहा है। दिल, गुर्दा, लिवर, हड्डियों के जोड़ इससे प्रभावित हो रहे हैं। हार्ट अटैक हो या गुर्दे फेल होना कई मरीजों में ऑटो इम्यून डिजीज ही इसका कारण बनता है। इन बीमारियों के होने के अज्ञात कारणों का भी अब पता लगाया जा रहा है। जिससे मरीज का इलाज भी संभव है। बस जरूरत है समय पर रोग को पहचानने और उसकी जांच कराने की। क्लीनिक इम्यूनोलॉजी सोसाइटी ऑफ इंडिया की पहली वार्षिक संगोष्ठी में ये जानकारी सोसाइटी के अध्यक्ष और संजय गांधी पीजीआई के इम्यूनोलॉजी विभाग के हेड प्रो. आरएन मिश्र ने शनिवार को दी। एसजीपीजीआई के टेलीमेडिसिन सभागार में आयोजित संगोष्ठी में उन्होंने बताया कि देश में सिर्फ दो संस्थानों संजय गांधी पीजीआई और पांडुचेरी के जवाहर लाल नेहरू पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल रिसर्च में इम्यूनोलॉजी विभाग हैं। अभी तक सिर्फ देश भर में इम्यूनोलॉजी के 50 ही विशेषज्ञ हैं। इसलिए इन विभागों को शुरू करने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि जोड़ों के दर्द, लंबे समय तक बुखार, रक्तस्राव रुक न रहा हो और ये लक्षण युवा महिलाओं में हो तो ऑटो इम्यून डिजीज होने की संभावना और अधिक बढ़ जाती है। प्रो. आरएन श्रीवास्तव ने बताया कि अधिकतर मरीज उनके पास इन लक्षणों के बावजूद तीन से चार साल में पहुंचते हैं। जबकि दो से तीन माह तक इस तरह के लक्षण मिलें तो तुरंत इम्यूनोलॉजी विशेषज्ञ से मिलना चाहिए। जनता के साथ-साथ चिकित्सकों को भी ऑटो इम्यून डिजीज की जानकारी होना जरूरी है। उन्होंने बताया कि कुल जनसंख्या का एक फीसदी ऑटो इम्यून डिजीज की चपेट में हैं। जबकि दस में से नौ महिलाएं और एक पुरुष ऑटो इम्यून डिजीज से ग्रस्त हो सकते हैं। यदि सही समय पर बीमारी की जानकारी मिल जाए तो इलाज कर मरीजों को बचाया जा सकता है।
कम आयु में हार्ट अटैक ऑटो इम्यून डिजीज के कारण ः लखनऊ। एसजीपीजीआई के इम्यूनोलॉजी विभाग के डॉ. विकास अग्रवाल ने बताया कि कम उम्र में हार्ट अटैक के बढ़ते मामले ऑटो इम्यून डिजीज के कारण ही है। आम तौर पर 45 वर्ष के बाद हार्ट अटैक की संभावना होती है। लेकिन 30 से 35 वर्ष की उम्र में हार्ट अटैक होना ऑटो इम्यून डिजीज के कारण होता है। इसमें हृदय में रक्त ले जाने वाली वाहनियां ऑटो इम्यून डिजीज की वजह से जल्दी बंद हो जाती हैं। इसके अलावा गुर्दे फेल होने के मामले में भी ऑटो इम्यून डिजीज की भूमिका है। एसएलई (सिस्टमिक ल्यूमस एरिथ्रीमेटस) एंटीबॉडी के कारण गुर्दे फेल हो जाते हैं। पीजीआई में गुर्दे फेल होने की शिकायत लेकर आने वाले मरीजों में एसएलई भी पाया जाता है। एक्यूट रीनल फेल्योर (अचानक गुर्दे फेल होना) के मरीजों में एसएलई पॉजिटिव मिलता है तो उसे इलाज से ठीक किया जा सकता है। डॉ. विकास ने बताया कि साइनस (नाक-कान बंद) बीमारी भी ऑटो इम्यून डिजीज के कारण होती है। इसे वस्कुलाइटिस कहा जाता है। इसमें इलाज के बावजूद नाक व कान बंद रहते हैं। जांच में ऑटो इम्यून डिजीज पाए जाने पर इस बीमारी का इलाज संभव है।

क्या है ऑटो इम्यून डिजीज ः प्रो. आरएन मिश्रा ने बताया ऑटो इम्यून डिजीज में शरीर में मौजूद प्रतिरक्षण प्रणाली उसके खिलाफ ही कार्य करने लगती है। इस प्रतिक्रिया के कारण शरीर को रहे नुकसान को समय पर पहचान कर इम्यूनोलॉजी विभाग में परीक्षण कर इलाज कराया जा सकता है। ऑटो इम्यून डिजीज में जोड़ों के दर्द व अकड़न (रुमेटायड आर्थराइटिस) से विकलांगता का खतरा होता है। जबकि दिल, गुर्दे और लिवर इसके असर से कार्य करना बंद कर देते हैं। जिससे मरीज की मौत भी हो सकती है। संजय गांधी पीजीआई में इम्यूनोलॉजी विभाग की स्थापना 1989 में की गई थी। इसके पांडुचेरी में विभाग की स्थापना पीजीआई से डीएम करके निकले विशेषज्ञ ने की। वर्तमान में इम्यूनोलॉजी विभाग में तीन डीएम की सीटें हैं। इससे प्रतिवर्ष तीन विशेषज्ञ निकल रहे हैं। जबकि जरूरत इससे कहीं ज्यादा की है। इसलिए अन्य मेडिकल कॉलेजों में भी इम्यूनोलॉजी विभाग होने चाहिए। प्रो. मिश्रा ने बताया कि तीन साल पहले इम्यूनोलॉजी विभाग पोस्ट डॉक्टरल सर्टिफिकेट कोर्स (पीडीसीसी) भी कराता था, लेकिन एक विशेषज्ञ के सेवानिवृत्त होने के कारण ये कोर्स को बंद कर दिया गया है। इस कोर्स में चिकित्सकों और लैब टेकभनीशियनों को प्रशिक्षित किया जाता था।
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