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चांद के दीदार से खिल उठे चेहरे

Lucknow

Updated Mon, 20 Aug 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। चांद के दीदार के साथ ही ईद की खुशियां चारों तरफ फैल गईं। रोजेदारों के चेहरों पर ईद के चांद का नूर छा गया। सभी की जुबां पर ईद की मुबारकबाद थी। इस मौके पर नय्यर जलालपुरी ने अपने कलाम ईद पर कुछ यूं बयां किया...हर ताअस्सुब को जमाने से मिटाने केलिए ईद आई है, गले सबको लगाने के लिए, चांद निकला है फिजाओं में नए अज्म के साथ, नया एहसास हर एक दिल में जगाने के लिए। बच्चे-बड़े सभी ईद की तैयारियों में जुटे रहे। चांद का दीदार होते ही नूरानी महफिलें जवां हो गईं। कोई अमीर रहा न कोई गरीब। ईद की खुशी को सबने दिल से लगा लिया। सुन्नी बोर्ड ऑफ इंडिया के शहाबुद्दीन ने निजामबाग में महफिल-ए-नूर में कहा कि रमजान के पाक दिनों के बाद गरीबों को अमीरों के साथ खड़ा करने वाली यह ईद समानता के हर आयाम को पूरा करने का संकल्प दिलाती है। अल्लाह के बंदों ने पाक महीने में इबादत की और रोजा रखकर भूख-प्यास की अहमियत जानी। नमाजों में गुनाहों की माफी मांगी और जकात अदा कर गरीबों की मदद की। मौलाना मिर्जा नुसरत कहते हैं कि असल ईद वह है जिससे दूसरों की मदद हो। इसलिए ईद से पहले जकात-ए-फितरा अदा करने को कहा गया है। मौलाना बताते हैं कि ईद का असल मायने पहले हुआ करता था। तब ईद के हर लम्हे को इबादत की तरह देखा जाता था। आज लोग चांद रात में अपने लिये ही साजो सामान खरीदते हैं। पहले लोग गरीबों व दूसरों के लिए खरीददारी करते थे। ईद सबके बराबर से खुशी मनाने का नाम है। अगर कोई इस खुशी में शामिल नहीं है तो उसकी मदद ही आपकी असली ईद होगी। गरीब-गुरबा फकीरों को जकात-ए-फितरा दिए जाने का मकसद ही यही है कि पहले गरीबों की मदद करो फिर खुशी मनाओ।
अवध की ऐसी होती थी ईद...ः नवाब जाफर मीर अब्दुल्ला कहते हैं कि नवाबीन के दौर में अवध की ईद की महक दूर तक फैलती थी। गांव के गांव नवाबीन के दरवाजों पर डेरा डाल दिया करते थे। इसके अलावा नवाबीन रात में ही गरीब गुरबों के घरों में अनाज और अन्य चीजें पहुंचा दिया करते थे। ईद के दिन नवाबीन आम आवाम की तरह ही कुर्ता पायजामा पहन कर नमाज की सफ में खड़े होते थे। गले लग कर एक दूसरों को ईद की मुबारकबाद दिया करते थे। मौलाना रेहान कहते हैं कि ईद का दिन वह दिन हुआ करता था जब पूरे अवध में क्या बिहार बंगाल तक ईदी भेजी जाती थी। लखनऊ में नवाबीन के दरबारों में ईद की लजीज सिवईं और महफिलों का दौर चलता था।
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