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एफडीए में आफत, सैंपलिंग,जांच व लाइसेंस का काम ठप

Lucknow

Updated Thu, 09 Aug 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। मिलावटी खाद्य पदार्थों की रोकथाम के लिए गठित खाद्य व औषधि प्रशासन (एफडीए) खुद कोमा सी स्थिति में है। बीते पांच अगस्त से प्र्रदेश भर में खाद्य पदार्थों की जांच, सैंपलिंग व लाइसेंस जारी करने से जुड़ा कार्य ठप हो गया है। क्योंकि इसके लिए जिलों में अधिकृत डीओ (अभिहित अधिकारी) का कार्यकाल खत्म हो चुका है। वैधानिक पेच के चलते अब प्रशासन न तो बतौर डीओ कार्य कर रहे अधिकारियों का कार्यकाल बढ़ा पा रहा है और न ही नए की तैनाती हो पा रही है। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव मिलावटी व अपमिश्रित खाद्य पदार्थों के एडीएम कोर्ट में लंबित मामलों के निस्तारण पर पड़ा है। डीओ के बिना न तो किसी मामले की सुनवाई हो पा रही है और न ही एफडीए के स्तर के लाइसेंस ही जारी हो पा रहे हैं। प्रशासनिक स्तर पर व्याप्त इस गंभीर संकट को लेकर जिम्मेदार अधिकारी फिलहाल पूरी तरह चुप्पी साधे हैं। जिले में बतौर डीओ कार्यरत मुख्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी एसएच आब्दी ने इस मामले पर बातचीत करने पर नो-कमेंट्स कह चुप्पी साध ली जबकि एफडीए निदेशालय में अधिकांश जिम्मेदार अधिकारी शासन स्तर पर दौड़भाग में व्यस्तता की बात कह बातचीत से बचते दिखे। खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 के प्रावधानों के तहत मिलावटी व अपमिश्रित खाद्य पदार्थों की रोकथाम के लिए 4 अगस्त 2011 से लागू प्रावधानों में एक वर्ष तक की अवधि के लिए जिला स्तर पर अभिहित अधिकारी (डीओ) का काम काज सीएफएसओ स्तरीय अधिकारी से कराने की छूट राज्य सरकार को दी गयी थी। संसद से अनुमोदित नियमावली में साफ कहा गया था कि एक साल तक काम चलाऊ व्यवस्था के तहत ये डीओ कार्य करेंगे। इस समयावधि में राज्य सरकार पब्लिक सर्विस कमीशन से नियुक्ति अथवा विभागीय प्रोन्नति के आधार पर अभिहित अधिकारी की स्थायी तैनाती सुनिश्चित करेगी। लेकिन शासन स्तर पर साल भर तक जनता की सेहत से जुड़े मामले में स्थायी व्यवस्था देने के लिए कोई प्रयास नहीं हुए। विभागीय सूत्रों के अनुसार इसके चलते ही चार अगस्त शाम पांच बजे से जिला प्रशासन से सीधे जुड़े एफडीए के कार्यरत सभी कार्यवाहक डीओ वैधानिक तौर पर जिम्मेदारी संभालने की योग्यता से वंचित हो गए। इस गतिरोध को दूर करने में परेशानी यह है कि अभी तक एफडीए कर्मचारियों की सेवानियमावली तक का अनुमोदन लटका हुआ है। ऐसे में विभागीय स्तर पर प्रोन्नति कर डीओ बनाए जाने का रास्ता भी नहीं सूझ रहा।
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