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मोबाइल इंडियन: मोबाइल के जरिए कहां पहुंचे हम

waseem ansari

waseem ansari

Updated Tue, 21 Jan 2014 01:01 PM IST
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इस बात में अब कम ही संदेह है कि साल 2014 मोबाइल फ़ोन का साल होगा, जिसे शुरू में चौथा स्क्रीन कहा जा रहा था। जैसे-जैसे हाईस्पीड वायरलेस धीरे-धीरे भारत में जड़ें जमा रहा है, उसे देखते हुए अब वह मज़बूती से पहले स्क्रीन के बतौर अपनी जगह बना लेगा।
कुछ हफ़्तों में होने वाली स्पेक्ट्रम की नीलामी से कुछ हद तक इस साल स्मार्टफ़ोन के फैलाव की रफ़्तार तय हो जाएगी।

मोबाइल पर मिलने वाली कुछ सेवाओं का विस्तार इसे और प्रोत्साहित कर सकता है। मगर मोबाइल कई और वजहों से भी इस प्रक्रिया का केंद्र बना रह सकता है।

दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफ़ोन बाज़ार
उम्मीद है कि भारत साल 2014 के दौरान दूसरे सबसे बड़े स्मार्टफ़ोन बाज़ार के बतौर उभरकर आएगा और इस मामले में अमरीका को पीछे छोड़ देगा जो इस वक़्त चीन के बाद सबसे बड़ा मोबाइल बाज़ार है।

इस साल भारत में तक़रीबन 20 करोड़ स्मार्टफ़ोन बिकने की उम्मीद है, जिसके बाद स्मार्टफ़ोन आबादी 35 करोड़ तक पहुंच जाएगी। हालांकि कई स्मार्टफ़ोन डेटा सर्विस के लिए इस्तेमाल नहीं किए जाते जो टेलीकॉम ऑपरेटरों के लिए एक चुनौती की तरह है, और जिससे उन्हें साल 2014 में भी निपटना होगा।

वायबर मीडिया के कंट्री हेड अनुभव नैय्यर कहते हैं, “तक़रीबन 20 करोड़ पहली बार स्मार्टफ़ोन ख़रीदने वाले इस बाज़ार को आगे बढ़ाएंगे।

स्पेक्ट्रम नीलामी का तीसरा दौर
स्मार्टफ़ोन धारकों की बढ़ती तादाद के साथ ही टेलीकॉम स्पेक्ट्रम की नीलामी तीन फ़रवरी को शुरू हो रही है जिस पर दुनियाभर की मोबाइल इंडस्ट्री की नज़र है।

आठ टेलीकॉम कंपनियों ने नीलामी प्रक्रिया में हिस्सेदारी के लिए आवेदन किया है।

तो क्या 10 करोड़ ग्राहकों के साथ काम कर रहीं पांच टेलीकॉम कंपनियां इस कारोबार के भविष्य को बदलने में कामयाब होंगी, यह विवादास्पद सवाल है।

ऊंची दरें
अगर कंपनियों की बोली ज़्यादा होती है तो टेलीकॉम दरें बढ़ेंगी। जब से साल 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने 122 टेलीकॉम ऑपरेटरों के लाइसेंस रद्द किए। टेलीकॉम कंपनियों के हाथ में दरों को अपने हाथ में लेने की ताक़त लौट आई है।

तीसरे दौर की नीलामी ख़त्म होने के बाद दरें बढ़ने की आशंका है। अपने लिए बाज़ार तलाश रहे ये प्रतिस्पर्धी दरों को बढ़ा सकते हैं।


वायबर के नैय्यर कहते हैं, “डाटा पर ख़र्च होने वाला पैसा, आपके फ़ोन बिल के फ़ीसदी के बतौर बढ़ सकता है।”

ई-कॉमर्स हुआ निजी
ऑनलाइन बाज़ार के फैलाव के साथ ई-कॉमर्स के व्यक्तिगत होने के आसार बढ़ गए हैं। स्वीटटच, गिवेटर और ऑलमैमॉयर्स जैसी वेबसाइट्स ने ग्राहकों को अपनी शॉपिंग को व्यक्तिगत बनाने के मौक़े मुहैया कराए हैं।

इसके बाद ये साइटें पूरे वर्ल्ड वाइड वेब से बेहतरीन विकल्पों को उपलब्ध करा सकती हैं। वेब में तलाशने की कोशिश क्यों करना जब यह प्रक्रिया ऑटोमेटेड हो सकती है।

ऑलमैमॉयर्स के सह-संस्थापक और सीईओ मृगांक शेखर कहते हैं, “हमारा लक्ष्य ग्राहकों को एक पूरी तरह से उपयुक्त प्लेटफ़ॉर्म देना है। यह सब मोबाइल डिवाइस पर उपलब्ध होना चाहिए।”

वियरेबल डिवाइस का फ़ैशन?
जिन डिवाइसों को आप पहन सकते हैं और जो पूरी तरह इंटरनेट से जुड़ी रहती हैं, वो आपकी गतिशीलता को नया आयाम दे सकती हैं।

ऐसी डिवाइसें साल 2014 में मुख्यधारा की डिवाइसें बन जाएंगी और उनकी सप्लाई पिछले साल के 10 करोड़ के मुक़ाबले दोगुनी होने की उम्मीद है।

इसका मतलब यह है कि आपकी कार, घड़ी, जूते और यहां तक कि कपड़े तक कनेक्टेड हो सकते हैं। कुछ लोगों के लिए यह डरावना विचार हो सकता है और निजता के सवाल भी खड़े कर सकता है।

क्लाउड बनेगा निजी
जैसे-जैसे कंपनियां और लोग डिवाइसों से आगे बढ़ेंगे, वे क्लाउड की तरफ़ जाएंगे। ज़्यादातर डाटा ग्राहक चलते-फिरते हासिल कर पाएंगे, चाहे उनकी डिवाइस कोई भी क्यों न हो।

सलाहकार फ़र्म गार्टनर के मुताबिक़, “कोई भी डिवाइस पहला केंद्रबिंदु नहीं होगी। इसके बजाय, निजी क्लाउड यह भूमिका निभाएगा।”

मोबाइल से लेन-देन बढ़ेगा
बैंकों और मोबाइल कंपनियों की तैयारी के बाद, आरबीआई के हस्तक्षेप से मोबाइल के ज़रिए छोटे-छोटे लेन-देन बढ़ाए जा सकेंगे। आरबीआई चाहता है कि टेलीकॉम ऑपरेटर बैंकों के साथ मिलकर मोबाइल वैलेट लॉन्च करें।
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टेलीकॉम कंपनियां मोबाइल के ज़रिए ख़रीद पर एक सेवा-शुल्क लगाना चाहती थीं और सामान की बिक्री के मिले राजस्व में भागीदारी चाहती थीं। इस सिलसिले में सभी पार्टियों के हितों को लेकर नियामक कार्यवाही के ज़रिए मोबाइल लेन-देन को बढ़ाया जा सकता है।

70 करोड़ सक्रिय मोबाइल फ़ोन ग्राहकों के साथ भारत का यह मोबाइल मनी बाज़ार दुनियाभर में हर जगह अपनी पहचान स्थापित कर सकता है।

इंसान नहीं मशीनें
एक दूसरे से बात करने वाले इंसानो के मुक़ाबले एक दूसरे से बात करने वाली मशीनें ज़्यादा कार्यकुशल होती हैं।

मिसाल के लिए, एक दूसरे से बात करके मशीनें ई-कॉमर्स ज़्यादा व्यक्तिगत बनाने में मददगार हो सकती हैं और बैंक और टेलीकॉम कंपनी के बीच मोबाइल लेन-देन को आसानी से करा सकती हैं।

कई औद्योगिक प्रक्रियाएँ ऑटोमेटेड हो सकेंगी और इतनी दक्षता बढ़ा देंगी जो उद्योगों में अब तक नहीं देखी गई थी। मोबाइल से मोबाइल संवाद को बढ़ाने की दिशा में हालांकि डाटा की सुरक्षा की गारंटी एक अहम मुद्दा होगा जिसे हल करना ज़रूरी होगा।

निजता का सवाल
क्या ऐसी दुनिया हो सकती है जहां आपका डाटा सुरक्षित हो? यह मुद्दा एडवर्ड स्नोडेन की दुनिया से बातचीत के बाद सामने आया और आगे भी उठाया जाता रहेगा।

जैसे-जैसे आप मोबाइल पर ज़्यादा वक़्त बिताना शुरू करेंगे और ऐप्स को आपकी स्थिति, चुनाव, संपर्क और मैसेज पाना आसान होता जाएगा, यह शायद साल 2013 के मुक़ाबले एक बड़ा सवाल बनकर उभरेगा।

हालांकि ये बदलाव आपका ध्यान खींच सकते हैं और आपके बटुए का कुछ हिस्सा पाने की होड़ कर सकते हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दल चुनाव से पहले मोबाइल का इस्तेमाल कैसे करते हैं।

सभी पार्टियां अब आपको अपने एक ख़ास नंबर पर ‘मिस कॉल’ देकर स्वयंसेवक बनने को कह रही हैं। ज़्यादा समझदारी भरे अभियान और ख़ासकर सोशल मीडिया पर वायरल होने लायक वीडियो का इस्तेमाल इस दिशा में एक गूंज पैदा करेंगे जो अभी तक किसी चुनाव में नहीं देखा गया है।

अगर कोई एक ऐसा ट्रैंड है, जो इस साल मोबाइल के लिए एकसमान रहेगा, तो वह सिर्फ़ वह पैमाना है जिस पर चीज़ें घटित हो सकती हैं।

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