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क्रोध, निराशा को पल में दूर करता है ध्यान: श्री श्री रविशंकर

नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क

Updated Tue, 18 Dec 2012 11:33 AM IST
shri shri ravishanker maharaj
दैनिक जीवन में आप सभी प्रकार की परिस्थितियों के संयोग में आते हैं, जो चुनौतीपूर्ण व आप पर भार डालने वाली हो सकती हैं। ये परिस्थितियां मन की विभिन्न अवस्थाओं को जन्म देती हैं और न तो जीवन और न ही मन की अवस्थाएं अनुमति ले कर घटित होते हैं। इसलिए आप को जागरूकता के ऐसे स्तर की आवश्यकता है जिससे आप अच्छा चयन कर सकें।
ध्यान मन की विभिन्न अवस्थाओं के बीच संतुलन ला सकता है। आप भीतर के कठोर पहलु तथा नाज़ुक पहलु में अदल-बदल करना सीख सकते हैं। ज़रुरत पड़ने पर आप टिके भी रह सकते हैं और ज़रुरत पड़ने पर पकड़ ढ़ीली भी कर सकते हैं। ये क्षमता सभी में उपस्थित है, और ध्यान आपको इन अवस्थाओं के बीच सहजता से अदल-बदल करने के लिए समर्थ बनाता है। ये सारा अभ्यास कठोर और नाज़ुक पहलुओं के बीच आगे-पीछे अदल-बदल करने की क्षमता का विकास करने के लिए है।

ध्यान न कर सकने के बड़े से बड़े निवारकों में एक ये है कि लोगों के पास पर्याप्त समय नहीं है। इस पर भी, यदि वे ध्यान करना आरंभ करते हैं, तो पाते हैं कि उनके पास अधिक समय है, क्योकि वे केन्द्रित हो सकते हैं और अधिक कार्य करवा सकते हैं। यही नहीं, ध्यान का नियमित अभ्यास बेहतर अंतर्ज्ञान की ओर ले जाता है। सकेंद्रितता द्वारा मन को ये तीक्ष्ण बनाता है एवं विश्राम द्वारा मन को विकसित करता है।

व्यक्ति के दैनिक जीवन में ध्यान के अनुकलन से, चेतना की पांचवीं अवस्था, जिसे ब्रह्म चेतना कहते हैं, प्रकट होती है। ब्रह्म चेतना का अर्थ है समग्र ब्रह्माण्ड को स्वयं के भाग रूप समझना। जब हम विश्व को हमारे भाग की तरह गोचर करते हैं, प्रेम प्रभावशाली रूप से विश्व तथा हमारे बीच प्रवाहित होता है। ये प्रेम हमें जीवन के विरोधात्मक बलों एवं उपद्रवों पर काबू पाने के लिए सशक्त करता है। क्रोध और निराशा पल भर के लिए आकर ओझल हो जाने वाली क्षणिक भावनाएं मात्र बन जाती हैं।

विश्राम व क्रिया विरोधाभासी मूल्य है, लेकिन वे एक दुसरे के पूरक हैं। आप जितनी गहराई में विश्राम करने में सक्षम हैं, क्रिया में आप उतने ही अधिक गतिशील होंगे। चंचलता, उग्रता, इच्छाएं और महत्वाकांक्षा मन को उत्तेजित करते हैं और उसे भविष्य की योजनाओं में या भूतकाल के बारे में खिन्न व व्यस्त रखते हैं। सच्ची मुक्ति अतीत और भविष्य से मुक्ति है।

ज्ञान, समझदारी और अभ्यास का संगम जीवन को सम्पूर्ण बनाते हैं। जब आप चेतना की उच्चतर अवस्था में आगे बढ़ते हो, तुम पाते हो कि विभिन्न परिस्थितियों और उपद्रवों से असंतुलित होकर अब आप गिर नहीं जाते। नियमित अभ्यास दिन भर शांति और उर्जा तथा विकसित सजगता बनाए रखने के लिए आपके तंत्रिका तंत्र को उन्नत करके आपके जीवन की गुणवत्ता को पूरी तरह से बदल देते हैं। आप एक सुंदर व्यक्ति बन जाते हो जो किसी शर्त के बिना जीवन में विभिन्न मूल्यों को अनुकूल बनाने में समर्थ हो।

श्री श्री रविशंकर परिचय
मानवीय मूल्यवादी, शांतीदूत और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया। महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास लेने की तकनीक) की खोज की।

(स्रोतः आर्ट ऑफ लिविंग)
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