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जिसे मिल गया यह धन वह बन गया धनवान

राकेश/इंटरनेट डेस्क।

Updated Thu, 08 Nov 2012 12:27 PM IST
satisfaction is unlimited wealth
धनवान बनना भला कौन नहीं चाहता। लेकिन किसी भी धनवान से पूछ कर देखिए कि क्या वह धन से संतुष्ट है, उसका उत्तर होगा भाई, पैसे की तो इतनी दिक्कत है कि क्या बताऊं। यानी जिसे धनवान मान रहें हैं वह भी धन के लिए रोता हुआ दिखाई देगा। तो फिर सवाल उठता है कि धनवान कौन है। इसका उत्तर दिया है कबीर दास जी ने 'गोधन, गजधन, बाजिधन और रतन धन खान। जब आवे संतोष धन सब धन धूरि समान।। कहने का मतलब यह है कि जिसके पास संतोष रूपी धन आ जाता है उसे और किसी धन की जरूरत नहीं होती है।
यही संतोष रूपी धन हनुमान जी को प्राप्त हो गया था। कथा है कि लंका से लौटने के बाद भगवान राम ने राज्याभिषेक के बाद सभी लोगों को कुछ न कुछ उपहार दिया। जब हनुमान जी की बारी आयी तो भगवान राम ने अत्यंत मूल्यवान मोतियों की माला अपने गले से उतारकर हनुमान जी को दिया। हनुमान जी ने अपने दांतों से माला तोड़ दिया और एक-एक मोती लेकर बड़े गौर से देखने लगे।

जब सभी मोतियों को हनुमान जी ने देख लिया तब हाथ जोड़कर राम जी से बोले 'प्रभु किसी भी मोती में आपकी छवि नहीं है, मैं इन मोतियों का क्या करूंगा'। ऐसे कहते हुए हनुमान जी ने अपनी छाती चीर कर हृदय में बसे राम और सीता की छवि भगवान राम की सभा में उपस्थिति लोगों को दिखाई। भगवान राम हनुमान जी की भक्ति और संतोष को देखकर प्रसन्न हो उठे और गले से लगा लिया।

संतोष के परम सुख के विषय में एक संत ने कहा है 'चाह गयी, चिंता मिटी, मनुवा बेपरवाह। जिसको कछू न चाहिये, वो ही शहंशाह'। संत ने साफ-साफ कहा कि चाह से ही चिंता होती है। चिंता ही दुःख का कारण है। जिसकी चाहत समाप्त हो गयी है वह प्रसन्न है जितना है उसी में खुश है, ऐसा व्यक्ति ही शहंशाह है।

भगवान श्री कृष्ण ने गीता में संतोष की महिमा को समझाते हुए कहा है कि 'तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्‌। अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ अर्थात जो निंदा और स्तुति को समान समझता है, जिसकी मन सहित सभी इन्द्रियाँ शान्त है, जो हर प्रकार की परिस्थिति में सदैव संतुष्ट रहता है जिसे किसी चीज में आसक्ति नही होती है ऎसा स्थिर-बुद्धि के साथ भक्ति में स्थित मनुष्य मुझे प्रिय है। इससे स्पष्ट होता है कि संतुष्टि से ही भगवान को पाने का मार्ग भी निकलता है। संतोष रूपी धन के कारण ही हनुमान जी के हृदय में राम और सीता की छवि प्रकट हुई थी।

संतोष के साथ सुख की बात कबीर दास जी सरल शब्द में कहते हैं। सॉईं इतना दीजिए, जामें कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधू न भूखा जाय। आर्थात भगवान से इतना ही कहिये कि हे प्रभु मेरे पास इनता हो कि जिसमें मैं और मेरा परिवार का भरण-पोषण हो जाए। अगर कोई संत मेरे द्वार आए तो उसे भूखा न जाना पड़े। जिसने संतोष की इस महिमा को समझ लिया वास्तव में वही धनवान है।

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