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तो साल में एक बार नहीं, रोज होगी दीवाली: आशाराम बापू

नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।

Updated Sat, 10 Nov 2012 10:12 AM IST
asharamram bapu divali pravachan
रावण का वध कर रामजी अयोध्या आये तो अयोध्यावासियों के मन में उमंग, उत्साह, आह्लाद पैदा हुआ और उन्होंने दीप जगमगाये, तब से दिवाली मनायी जाने लगी। ऐसा वर्णन पुराणों में बार-बार आता है। राम वनवास में थे तो अंधेरा था और राम अयोध्या में आये तो दिवाली।
ऐसे ही हर जीव का वासनाओं के प्रभाव से राम-वनवास हो गया है। यह जीव इस देहरूपी अयोध्या में रहता है। इस अयोध्या के नौ द्वार हैं। दस इन्द्रियों में रत रहनेवाला जीव दशरथ है, वह इसमें राज्य करता है। तीन उसकी रानियाँ हैं सत्त्व, रज और तम- कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी। दशरथ चाहते हैं कि रामराज्य हो और गुरु वशिष्ठ कहते हैं कि ‘हाँ, राज्याभिषेक की तैयारियाँ करो।’
 
दशरथ खुश होते हैं कि ‘अब रामराज्य होगा। मैं निश्चिंत हो जाऊँगा।’ किंतु वे कैकेयी के कहने में आ जाते हैं और राम-वनवास हो जाता है। साधक के जीवन में भी रामराज्य की तैयारी तो होती है लेकिन वह कैकेयी के प्रतीक कीर्ति के कहने में अथवा तमस्, आलस्य-प्रमाद के कहने में आ जाता है, अंतर्ज्योति का सहारा नहीं लेता है तो रामराज्य (आत्मराज्य) के बदले राम-वनवास (आत्मविमुख) हो जाता है। राम अयोध्या में आते हैं तो जीव की दिवाली होती है।
 
राम अयोध्या से दूर हैं तो अयोध्यावासियों के पास सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है और राम अयोध्या में हैं तो दीवारें भी प्रसन्नता का एहसास करती हैं, वृक्ष भी धन्यवाद पुकारते हैं, हर नगरवासी आनंदित रहता है। ऐसे ही तुम्हारे दिल में अगर राम प्रकट हो जायें तो तुम्हारी केवल बारह महीने में एक बार दिवाली नहीं, हर रोज, हर क्षण दिवाली होगी।

संत श्री आशारामजी बापू परिचय

संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।

गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से  सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं। 
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