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पतिव्रत की शक्ति दर्शाता है करवाचौथ व्रत कथा

राकेश/इंटरनेट डेस्क।

Updated Fri, 02 Nov 2012 01:46 PM IST
karvachauth vrat katha
कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को करवाचौथ का व्रत मनाया जाता है। इस व्रत में महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और दांपत्य जीवन में प्रेम तथा सामंजस्य के लिए पूरे दिन निर्जला उपवास रखती हैं। करवाचौथ व्रत, वटसावित्री एवं हारितालिका तीज के समान ही दांपत्य जीवन के लिए शुभफादायी होता है। इस व्रत से संबंधित कई कथाएं प्रचलित हैं। करवाचौथ का व्रत रखने वाली महिलाएं इन्हीं कथाओं को सुनकर अपना व्रत पूरा करती हैं।
करवाचौथ की पहली कथा
एक समय की बात है कि एक गांव में करवा नाम की पतिव्रता स्त्री रहती थी। एक दिन करवा के पति नदी में स्नान करने गये। स्नान करते समय एक मगरमच्छ ने करवा के पति के पांव पकड़ लिये और नदी के अंदर खींचने लगा। प्राण पर आये संकट को देखकर करवा के पति ने करवा को पुकारना शुरू किया।

करवा दौड़कर नदी के तट पर पहुंची जहां मगरमच्छ उसके पति के प्राण लेने पर तुला था। करवा ने झट से एक कच्चे धागे से मगर को बांध दिया। इसके बाद करवा यमराज के पास पहुंची। यमराज से करवा ने कहा कि मगरमच्छ ने मेरे पति का पैर पकड़ लिया है। मगर को मेरे पति के पैर पकड़ने के अपराध में आप अपने बल से नरक में भेज दो।

यमराज ने कहा कि मैं ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि मगर की आयु अभी शेष है। इस पर करवा बोली, अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो मैं आप को श्राप देकर नष्ट कर दूंगी। करवा के ऐसे वचन सुनकर यमराज डर गए और करवा के साथ आकर मगरमच्छ को यमपुरी भेज दिया। करवा के पति को दीर्घायु का आशीर्वाद मिला। कथा पूरी होने के बाद महिलाएं प्रार्थना करती हैं कि 'हे करवा माता! जैसे तुमने अपने पति की रक्षा की, वैसे सबके पतियों की रक्षा करना।'

करवाचौथ की दूसरी कथा
बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा थी। सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहां तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी। उसी दौरान करवाचौथ का व्रत आया। करवा ने अपने पति की लंबी आयु के लिए करवाचौथ का व्रत रखा। लेकिन भूख से करवा की हालत खराब होने लगी। छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं गयी। छोटे भाई ने दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख दिया। दूर से देखने पर चलनी की ओट में रखा दिया चतुर्थी के चाँद जैसा नज़र आ रहा था।

इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चाँद निकल आया है, तुम उसे देखकर भोजन कर सकती हो। बहन ने ऐसा ही किया। चलनी की ओट में रखे दीया को देखकर करवा ने अपना व्रत खोल लिया। इससे करवा के पति की मृत्यु हो गयी। करवा के भाभी ने कहा कि वास्तविक चांद को देखे बिना व्रत खोलने के कारण उसके पति की मृत्यु हुई है।

सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी। अपने सतीत्व से पति को पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रही और उसकी देखभाल करती है। पति के ऊपर उगने वाली सूई नुमा घास को वह एकत्रित करती जाती। एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आया। सभी भाभियों ने करवा चौथ का व्रत रखा। जब भाभियां करवा से आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से 'यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो' ऐसा आग्रह करती है।

लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने के लिए कह कर चली जाती है। सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है, लेकिन वह टालमटोली करने लगती है। इसे देख करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है।

सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। अपनी छोटी उंगुली को चीरकर छोटी भाभी करवा के पति के मुंह में अमृत डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्री गणेश-श्री गणेश कहता हुआ उठ बैठता है।

करवा चौथ की तीसरी कथा
शाकप्रस्थपुर वेदधर्मा ब्राह्मण की विवाहिता पुत्री वीरवती ने करवा चौथ का व्रत किया था। नियमानुसार उसे चंद्रोदय के बाद भोजन करना था, परंतु उससे भूख नहीं सही गई और वह व्याकुल हो उठी। उसके भाइयों से अपनी बहन की व्याकुलता देखी नहीं गई और उन्होंने पीपल की आड़ में आतिशबाजी का सुंदर प्रकाश फैलाकर चंद्रोदय दिखा दिया और वीरवती को भोजन करा दिया।

परिणाम यह हुआ कि वीरवती के पति की मृत्यु हो गयी। अधीर वीरवती ने बारह महीने तक प्रत्येक चतुर्थी को व्रत रखा और करवा चौथ के दिन उसकी तपस्या से उसका पति पुन: प्राप्त हो गया।
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