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पिण्डदान करने से घर आती है सुख-समृद्धि

राकेश/इंटरनेट डेस्क

Updated Fri, 05 Oct 2012 12:50 PM IST
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शास्त्रों में कहा गया है कि पितृ का स्थान देवताओं के समान है। देवता अगर प्रसन्न हों लेकिन पितृ नाराज हों तो देवताओं से शुभ फल मिलने में बाधा आती है। इसलिए पितरों को प्रसन्न रखने में लिए श्राद्ध और पिण्डदान का नियम बनाया गया है। भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक के समय को श्राद्ध पक्ष कहा जाता है।
इस दौरान पितृगण धरती पर आते हैं और अपनी संतान से पिण्डदान एवं श्राद्ध का अंश प्राप्त कर संतुष्ट होते हैं। श्राद्ध पक्ष में जो लोग पितरों का तर्पण और पिण्डदान नहीं करते हैं पितर उनसे नाराज होते हैं। फलस्वरूप पितृ पूजा नहीं करने वालों को साल भर परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
 
पितरों तक पहुंचता है श्राद्ध का अंश
गरूड़ पुराण के अनुसार पितरों के निमित्त किया गया श्राद्ध का अंश पितर जिस लोक में होते हैं उन तक पहुंच जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि पितरों का नाम और गोत्र लेकर मंत्र सहित जो अन्न जल अर्पित किया जाता है वह पितरों तक अलग-अलग रूप में पहुंचता है। अगर कर्मों के अनुसार पितृ देवलोक में होते हैं तो श्राद्ध का अंश उन्हें अमृत रूप में प्राप्त होता है।

गन्धर्व लोक में होने पर भोग्य रूप में, पशु योनि में होने पर तृण रूप में श्राद्ध का अंश पहुंचता है। यक्ष होने पर पेय पदार्थ के रूप में, सर्प योनि में होने पर वायु रूप में और दानव योनि में होने पर मांस रूप में श्राद्ध का अंश पितृ गणों तक पहुंचता है।

प्रेत योनि में गये पितरों के पास श्राद्ध का अंश रक्त रूप में तथा मनुष्य होने पर अन्न रूप में पहुंचता है। जिन पितृ गणों को मुक्ति मिल चुकी होती है उनके पास गया अंश आशीर्वाद बनकर श्राद्ध करने वाले के पास लौट आता है।

पितृ पूजा से लाभ
शास्त्रों में कहा गया है कि पितरों को संतुष्ट करने वाले व्यक्ति को कभी तकलीफ का सामना नहीं करना पड़ता है। जिनके पितर नाराज होते हैं उनकी कुण्डली में पितृ दोष पाया जाता है। पितृ दोष से पीड़ित व्यक्ति को संतान सुख में बाधा आती है। घर में कलह एवं आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन्हें प्रेत बाधा का भी सामना करना पड़ता है।

इसके विपरीत पितरों को संतुष्ट और प्रसन्न करने वालों को संतान सुख प्राप्त होता है। मान-सम्मान में वृद्धि होती है। धन संबंधी परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ता है। पितरों की पूजा एवं श्राद्ध करने वालों को मृत्यु के बाद उत्तम लोक में स्थान प्राप्त होता है। शास्त्रों में लिखा है कि जो लोग पितरों को संतुष्ट नहीं कर पाते हैं उन्हें स्वर्ग में स्थान नहीं मिलता है, क्योंकि उन पर पितृ ऋण चढ़ा रहता है।
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