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इसलिए वोट करेगा शिमला

Shimla

Updated Sat, 03 Nov 2012 12:00 PM IST
सीवरेज के पानी से शुरू होती है सुबह
राजधानी के हर चौथे आदमी की सुबह सीवरेज युक्त पानी से शुरू हो रही है। राज्य सरकार पांच साल में गिरि परियोजना को ही शुरू कर पाई है। शहरवासियों को 24 घंटे पानी मुहैया करवाने के सियासी दलों के दावे अभी तक अधूरे हैं। साल के 12 माह यहां लोगों को किसी न किसी गली, नुक्कड़ पर हाथ में खाली बर्तन लिए पानी की तलाश में निकलते देखा जा सकता है। सार्वजनिक नल के बाहर बर्तनों की लंबी कतारें यह बयां करने के लिए काफी हैं कि शासन में बैठे हुक्मरान पानी की किल्लत को दूर करवाने में कितने फिक्रमंद हैं।

महफूज नहीं लाखों के वाहन
राजधानी में आरामदायक सफर और रोज के बसों के लिए इंतजार से मुक्ति पाने को अपनी गाड़ी लेना जान को आफत लेने से कम नहीं। पिछले पांच से दस साल में हजारों की संख्या में बड़ी छोटी गाड़ियों की संख्या के कारण शहर की शायद ही कोई ऐसी सड़क हो, जहां सड़क किनारे गाड़ी पार्क न मिले। शहर में पार्किंग की समस्या इस कद्र गंभीर हो गई है कि आज वाहन मालिकों को अपने से ज्यादा गाड़ी को पार्क करने की चिंता सताती है। शहर में आने वाले पर्यटकों तक के लिए उपलब्ध पार्किंग नाकाफी है। शहर में पंजीकृत वाहनों की संख्या 38 हजार के करीब है जबकि शहर में बनाई गई तेरह पार्किंगों में मात्र 480 गाड़ियों को खड़ा करने की ही व्यवस्था है।

सियासत की चक्की में पिसे करोड़ों के प्रोजेक्ट
हिल्सक्वीन की सूरत बदलने के लिए केंद्र सरकार का जेएनएनआरयूएम प्रोजेक्ट राजनेताओं, अफसरशाही और ठेकेदारों के स्वार्थों की भेंट चढ़ गया। यदि प्रोजेक्ट को सही मायनों में गंभीरता से लिया गया होता तो शिमला का सूरतेहाल बदल जाता। दिसंबर 2005 में लागू जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीनीकरण मिशन के तहत देश के 63 शहरों को चुना गया। केंद्र सरकार की ओर से इसके लिए करोड़ों का बजट भी जारी किया गया। प्रोजेक्ट के तहत शिमला को विशेष श्रेणी में रखा गया जिसमें फंडिंग रेशो 80; 10; 10 रखी। विकास कार्यों के लिए केंद्र सरकार की ओर से 80 फीसदी राशि और प्रदेश सरकार व म्यूनिसिपल कारपोरेशन को दस-दस फीसदी राशि खर्च करनी थी। शिमला में यह प्रोजेक्ट राजनीति की भेंट चढ़ने के कारण फेल साबित हो गया।

सिटी की सड़कों पर पैदल चलना मुसीबत
शिमला की सड़कों पर पैदल सफर मुसीबत से कम नहीं है। पर्यटकों के साथ यहां बरसों से रह रहे लोग भय के साये में जीने को मजबूर हैं। शहर में वानर सेना के साथ ही कुत्तों का आतंक इस कदर हावी है कि राह चलते लोग हमेशा डरे-सहमे रास्ता पार करते हैं। कब कोई बंदर झपट कर लहूलुहान कर दे, कोई पता नहीं। बस्तियों में लावारिस कुत्तों की तादाद इतनी अधिक है कि ये शहरवासियों के नाक में दम कर देते हैं। सरकारी और नगर निगम स्तर पर इस समस्या से निपटने के आज तक जो भी प्रयास हुए हैं वे नाकाफी हैं। नगर निगम ने वन विभाग के साथ मिलकर बंदरों की नसबंदी कर इनकी संख्या कम करने की पहल की। इसके तहत बंदरों की नसबंदी भी टुटीकंडी में स्थापित आपरेशन थियेटर में की जाती रही, मगर इससे समस्या कम हुई हो ऐसा नजर नहीं आता।
हजार स्ट्रीट लाइटें खराब, रात को चलना दूभर
राजधानी शिमला में एक हजार से अधिक स्ट्रीट लाइटें खराब हैं। शाम ढलते ही शहर के कई रास्ते जोखिम भरे हो जाते हैं। नगर निगम और बिजली बोर्ड की लचर कार्यप्रणाली के चलते लोग अंधेरे में ठोकरें खाने को मजबूर हैं। जंगलों से सटे वार्डों के कई मार्गों में पांच साल में स्ट्रीट लाइटों की सुध तक नहीं ली गई है। शहर के बीचोंबीच के वार्डों को छोड़ दे तो हालत बदतर हैं। नगर निगम शिमला के तहत आने वाले पच्चीस वार्डों में 7200 के करीब स्ट्रीट लाइटों के प्वाइंट लगाए गए हैं। इनमें से 20 प्रतिशत लाइटें नान फंक्शनल हैं। यानि 1440 के करीब शहर में स्ट्रीट लाइटें बंद पड़ी हुई हैं। भराड़ी, रुलदूभट्टा, कैथू, समरहिल, टुटू, बालूगंज, टूटीकंडी, फागली, कृष्णानगर, जाखू, ढली, कनलोग, चम्याणा, मल्याणा, कसुम्पटी,, संजौली, छोटा शिमला पटयोग और खलीणी वार्ड के लोगों को खराब पड़ी स्ट्रीट लाइटों के कारण अधिक परेशानी झेलनी पड़ रही है। शहर के बीचोंबीच बसे वार्ड राम बाजार, लोअर बाजार और वीआईपी वार्ड बैनमोर में हालत जबकि कुछ ठीक हैं। लेकिन उक्त वार्डों में भी जहां स्ट्रीट लाइटों की अधिक जरूरत है। वहां आज भी नए प्वाइंट लगाने की जहमत उठाई नहीं गई है।


यह भी हैं शहर में समस्याएं
- शहर में युवाओं को खेलने के लिए खेल मैदानों का है अभाव।
- सीवरेज व्यवस्था बुरी तरह से चरमरा गई है। आवेदन के बाद भी सुविधा नहीं मिल पा रही।
- हिल्सक्वीन शिमला में सड़क मार्गों के गड्ढे सफर को हिचकोलों भरा बना रहे हैं।
- नालों के चैनलाइजेशन न होने से सैकड़ों रिहायशी भवनाें पर खतरा मंडरा रहा है।
- बुजुर्गों को घूमने-फिरने के लिए नहीं पार्क।
- अवैध भवनों को नियमित करने के लिए नहीं आई वन टाइम सेटलमेंट।

इन घोषणाओं पर अभी तक नहीं गया ध्यान
- राजधानी शिमला में स्काई ट्रेन बनाने की बात फाइलों में दफन हो गई है।
- आईएसबीटी, लोकल बस स्टैंड तथा जाखू मंदिर तक नहीं बना रोप वे।
- माल रोड और रिज मैदान तक पहुंचने को लगनी थी स्वचालित सीढ़ियां।
- एमएनसी पार्किंग बनने से लिफ्ट के प्रयोग से स्वयं पार्क होनी थी गाड़ियां।
- ट्रैफिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए शहर में नहीं बन पाई पर्याप्त टनल।
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