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पौष्टिक खुराक यकीनी बनाना सबसे बड़ी चुनौती

Ludhiana

Updated Thu, 29 Nov 2012 12:00 PM IST
लुधियाना। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में भोजन और जीवन निर्वाह सुरक्षा के लिए पायदार खेती विषय पर चल रही अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस के दूसरे दिन माहिरों ने न्यूट्रीशिनल सिक्योरिटी, फूड प्रोसेसिंग, कृषि में आर्थिक विकास, पशु पालन और पौधा रोग इत्यादि विषयों पर मंथन किया गया। माहिरों ने समस्याओं पर विचार के साथ-साथ उनके समाधान को लेकर भी चर्चा की।
कांफ्रेंस में बुधवार को न्यूजीलैंड स्थित खोज संस्थान के सीनियर वैज्ञानिक डा. रिचर्ड ई फालून ने कहा कि विश्व में बढ़ रही आबादी के लिए पौष्टिक खुराक को यकीनी बनाना सबसे बड़ी चुनौती है। इसके अलावा वातावरण, मौसमी बदलाव, जैविक संपत्ति को दरपेश क्षेत्रीय एवं प्राकृतिक आपदाओं से लड़ने के लिए पौधा रोग सुरक्षा वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी बढ़ी है। तमाम कोशिशाें के बावजूद विश्व की तीस फीसदी आबादी के लिए आज भी भोजन सुरक्षा यकीनी नहीं है। नवीनतम बायो टेक्नोलॉजी विधि से सेहतमंद फसलें तैयार करके रोग मुक्त फसलें पैदा करने पर फोकस करना होगा।
अमेरिका के हायो स्टेट विश्वविद्यालय से आए वैज्ञानिक डा. परविंदर सिंह ग्रेवाल ने सलाह दी कि पेस्टीसाइड का इस्तेमाल सही ढंग से किया जाए। आस्ट्रेलिया से आए वैज्ञानिक डा. जोरा सिंह खंगूड़ा ने कहा कि विश्व में आम को फलों का बादशाह माना जाता है। 94 देशों में आम की पैदावार की जा रही है, इनका कुल उत्पादन 35.9 मिलियन टन है। पेड़ से तोड़ने के बाद सही संभाल न होने के चलते 8.6 मिलियन टन का नुकसान हो जाता है। यह अमेरिकन डालर के हिसाब से 335.2 मिलियन सालाना बनती है। यह कुल उत्पादन का तीस फीसदी है। जेनेटिक इंजीनियरिंग के साथ आम की ताजगी अधिक वक्त तक कायम रखना अब जरूरत बन गया है।
न्यूजीलैंड से आए वैज्ञानिक डा. हरजिंदर सिंह ने कहा कि विकसित देशों में उत्पादन से खपतकार तक सुरक्षित ढंग से अनाज पहुंचाना मुश्किल नहीं है, लेकिन विकासशील देशों में सही संभाल न होने के कारण यह समस्या गंभीर है। भोजन के जरूरत से अधिक इस्तेमाल ने मोटापे जैसी समस्याओं को जन्म दिया है। सेहत को सुरक्षित रखने के लिए नैनो टेक्नोलॉजी जैसी विधियों को भोजन पैदा करने वाले क्षेत्रों में भी इस्तेमाल करना चाहिए।
खेती कर रहे परिवारों की जरूरतें नहीं हो रहीं पूरी
भारतीय कृषि को दरपेश मुश्किलों पर खोज केंद्र के निदेशक डा. रमेश चंद्र ने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कृषि के तहत आता है। दो दशकों से गैर कृषि क्षेत्र में तेज विकास हो रहा है। देश की कुल राष्ट्रीय उपज में खेती का हिस्सा 1950-51 में 56 फीसदी था, अब कम होकर 16 फीसदी रह गया है, यह चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि जमीन, पानी एवं जैविक संपत्ति आधारित हिस्सेदारी कम हो रही है। इन हालत में पाएदार खेती संकट में है। खेती कर रहे परिवारों की जरूरतें पूरी नहीं हो रही हैं। नतीजतन किसानों का खेती के प्रति उत्साह ठंडा हो रहा है। बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए लंबी अवधि की नीतियां बनाने की जरूरत है।
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