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पावर संकट खत्म करने का दिया फार्मूला

Ludhiana

Updated Thu, 05 Jul 2012 12:00 PM IST
लुधियाना। लुधियाना के उद्यमियों ने सरकार को बिजली संकट से निबटने के लिए नया फार्मूला दिया है। आल इंडिया इंडक्शन फर्नेस एसोसिएशन के पंजाब चैप्टर के चेयरमैन संदीप जैन का कहना है कि भारी भरकम करों के कारण उद्यमियों को फिलहाल निजी क्षेत्र से बिजली की खरीद महंगी पड़ रही है। इसलिए सारी स्टील इंडस्ट्री पूरी तरह से पावरकॉम पर ही निर्भर है। पावरकॉम उपभोक्ताओं को 24 घंटे बिजली आपूर्ति करने में नाकाम साबित हो रहा है।
निजी क्षेत्र से बिजली खरीद का फार्मूला
लुधियाना। इंटरनेशनल एनर्जी एक्सचेंज (आईईएक्स) में निजी और सरकारी क्षेत्र के बिजली निर्माता फालतू बिजली को लेकर अपनी उपलब्धता बताते हैं। इसके बाद एक्सचेेंज पर बिजली खरीदने के लिए उद्यमी अपनी ऑनलाइन बिड डालते हैं। जिसका रेट ज्यादा हो जाता है, उसे बिजली मिल जाती है। पंजाब में निजी क्षेत्र से खरीदी गई बिजली की आपूर्ति भी उद्यमियों को पावरकॉम के नेटवर्क के जरिए की जाती है। जैसे ही उद्यमी एक्सजेंज में बिजली खरीद को अपनी ऑन लाइन बिड डालते हैं, तभी पावरकॉम के सिस्टम में इस संबंध में प्रोग्राम आ जाता है, उसी के अनुसार पावरकॉम के नेटवर्क से बिजली की आपूर्ति इकाई को की जाती है। इकाई में लगा एक खास यंत्र इसकी बकायदा रीडिंग रखता है।
पावरकाम इसके बदले में उद्यमियों से भारी भरकम चार्जेज लेता है। इनमें 84 पैसे क्रास सब्सिडी, 1.12 रुपये विलिंग चार्जेज, छह फीसदी लास के अलावा अन्य खर्चे मिला कर उद्यमियों को प्रति यूनिट करीब तीन रुपये प्रति यूनिट का खर्च पड़ रहा है। इतने भारी भरकम खर्च में निजी क्षेत्र से बिजली की खरीद संभव नहीं है।
ऑल इंडिया इंडक्शन फर्नेस एसोसिएशन के प्रेसिडेंट केके गर्ग ने कहा है कि रात के वक्त बिजली सस्ती और दिन में बिजली महंगी मिलती है। रात को कई बार दो रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से भी बिजली मिल जाती है। पंजाब में उद्योग को 5.10 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से बिजली मिल रही है। जबकि भारी चार्जेज के चलते निजी क्षेत्र से बिजली की खरीद संभव नहीं है। हां, सरकार यदि इनमें राहत दे तो स्टील उद्योग निजी क्षेत्र से बिजली खरीद कर अपनी इकाइयां चला सकता है। स्टील उद्योग में छह सौ मेगावाट तक बिजली की मांग रहती है। लगभग तमाम इकाइयों के पास निजी क्षेत्र से बिजली की खरीद के संसाधन मौजूद हैं, केवल सरकारी नीतियां ही आड़े आ रही हैं।
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