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कांजली वेटलैंड परियोजना दुर्दशा की शिकार

Jalandhar

Updated Thu, 29 Nov 2012 12:00 PM IST
कपूरथला। पवित्र काली बेईं स्थित कांजली वेटलैंड को पिकनिक स्पॉट बनाने के लिए कई योजनाएं बनीं, लेकिन सभी कागजों में ही सिमट कर रह गईं। इनमें बाल रेलगाड़ी, विद्युत हाइडल प्रोजैक्ट तथा डिजनी लैंड की तर्ज पर झूले आदि लगाने थे, लेकिन यह सब मुंगेरी लाल के हसीन सपने ही साबित हुए।
कांजली को विकसित करके पर्यटन के जरिए कपूरथला शहर की ‘शान’ में चार ‘चांद लगाने ’ और जिले की आय के स्रोत के साथ क्षेत्र में रोजगार के लिए अवसर प्रदान करने के उद्देश्य वाली कांजली वेटलैंड परियोजना दुर्दशा के दंश का शिकार हो गई है। पर्यटन के दायरे में आने वाला क्षेत्र पशुओं के लिए ‘चारगाह’ और चरवाहों के लिए आरामगाह बन कर रह गया है। अगर अतीत पर नजर दौड़ाई जाए तो एक समय ऐसा भी था, जब पवित्र बेईं नदी के किनारे स्थित कांजली एक धार्मिक स्थल के रूप में काफी विख्यात था। समय के साथ तेजी से हुए बदलाव से उपजे प्रदूषण ने इस सम्मान को कांजली से छीन लिया। अब तो लोग यहां पर तंत्र मंत्र के टोटके आदि के लिए ही आते हैं और बेईं में विभिन्न प्रकार की पूजा सामग्री विसर्जित कर चले जाते है। इस पर प्रशासन की बेपरवाही आग में घी का काम करती है। हालात को सुधारने के लिए संत बाबा बलबीर सिंह सीचेवाल ने इसके किनारों पर घाट का निर्माण कार्य और जलीय बूटी की साफ सफाई का काम भी करवाया, लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात वाली कहावत को चरितार्थ करती जिला प्रशासन की अनदेखी के चलते लोगों का आना तो दूर रहा, अब प्रवासी पक्षियों ने भी इधर से मुंह मोड़ लिया है। आश्चर्य की बात तो यह है कि बीते कई वर्षों से इसके विकास के लिए कोई भी फंड सरकार की ओर से नहीं मिला। कांजली को विकसित करने के मद्देनजर कांजली डेवलेपमेंट सोसायटी का गठन हुआ था, लेकिन इसके द्वारा कितना विकास हुआ कुछ भी पता नहीं।
नौका विहार के लिए किनारे पर रखी नौकाएं कबाड़ बनती जा रही है। बीते दिनों इस जगह पर प्रवासी पक्षी ब्लैक हॉक का झुंड आया था, लेकिन अनुकूलता न होने के वजह से किसी और तरफ को रुख कर गए। वैसे भी कभी यहां पर भारी संख्या में प्रवासी पक्षियों का तांता लगा रहता था।
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