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सिख विरासत से जुड़ी नायाब मुहर नीलाम होगी

Jalandhar

Updated Fri, 16 Nov 2012 12:00 PM IST
होशियारपुर। सिख इतिहास का नायाब नमूना और मुल्तान पर सिखों की पहली जीत की गवाह सोने की मुहर अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में नीलाम होगी। सिख विरासत की अमूल्य मणि मानी जाने वाली इस मुहर की लंदन की ऑक्शन फर्म स्पिंक एंड सन्स की ओर से अगले माह की 5 तारीख को बोली लगाई जाएगी।
साल 1772 में दुर्रानी साम्राज्य के शहंशाह अहमद शाह अब्दाली के महत्वपूर्ण शक्ति केंद्र के तौर पर जाने जाने वाले मुल्तान पर सिखों की जीत और उसके बाद वहां सात साल तक चले सिख साम्राज्य की ओर से जारी इस मुहर को दुर्लभतम माना जा रहा है। नीलामीकर्ता के मुताबिक इससे पहले सिखों की मुल्तान पर पहली जीत के बाद स्थापित साम्राज्य की मुहर का जिक्र रिकार्ड में नहीं है।
स्पिंक की जनसंवाद प्रतिनिधि सैंडी मेयलर ने जो जानकारी मीडिया को दी है उसके मुताबिक इस असाधारण दुर्लभ सोने की मुहर की नीलामी से 15 से 20 हजार पाउंड हासिल होने का अनुमान है। अहमद शाह दुर्रानी (अब्दाली) का दुर्रानी साम्राज्य दुनिया में उस समय तुर्क साम्राज्य के बाद दूसरा सबसे बड़ा इस्लामी साम्राज्य था। 1762 में अहमद शाह ने सिखों को वश में करने के लिए अफगानिस्तान को पार करते हुए लाहौर पर हमला किया और अमृतसर के पवित्र शहर में तबाही मचाने के बाद वहां के हजारों निवासियों की हत्या की। इसके दो ही सालों के भीतर सिखों ने अब्दाली के खिलाफ विद्रोह कर दिया और अमृतसर शहर और पवित्र स्वर्ण मंदिर का पुनर्निर्माण करा दिया। अहमद शाह ने कई बार सिखों को स्थायी रूप से अधीन करने की कोशिश की, लेकिन असफल रहा। अपनी मौत के पहले अहमद शाह को उत्तर में अन्य विद्रोहों का भी सामना करना पड़ा। उस वक्त शक्तिशाली सेना के रूप में स्थापित हो रहे सिखों ने दुर्रानी साम्राज्य को कड़ी चुनौती पेश की और अमृतसर के विनाश का बदला लेने के लिए दुर्रानी साम्राज्य के सबसे महत्वपूर्ण शक्ति केंद्र के तौर पर पहचान बना चुके मुल्तान पर हमला किया। पहली बार 1772 में सिखों ने मुल्तान को दुर्रानी साम्राज्य से छीन लिया और अगले सात वर्षों के तक वे इस पर काबिज रहे। मुल्तान पर इस पहली सात साल की कब्जे की अवधि (1772-79) के दौरान जारी किए गए सिक्कों को हमेशा दुर्लभ माना जाता रहा है। आज भी उनको बेशकीमती धरोहरों में शुमार किया जाता है।
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