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फिर राजनीतिक सक्रियता से दूर हुए हंस

Jalandhar

Updated Fri, 02 Nov 2012 12:00 PM IST
जालंधर। अंतर्राष्ट्रीय सूफी गायक हंस राज हंस राजनीतिक गलियारों में सक्रिय रहने के बाद अचानक फिर खो गए हैं। हंस की कम होती सक्रियता को लेकर कई तरह की चर्चा को जन्म दे रही है। लोगों के जेहन में एक बार फिर यह सवाल उठ रहा है कि हंस क्या फिर अज्ञातवास में चले गए हैं? भगवान वाल्मीकि के प्रकाशोत्सव के मौके पर शोभायात्रा में होर्डिंग्स पर हंसराज हंस की तस्वीरें तो दिखीं लेकिन वह नहीं दिखे। इतने बड़े धार्मिक आयोजन में हंस की गैर मौजूदगी ने कई तरह की चर्चाओं को जन्म दिया है, क्योंकि गायक खुद वाल्मीकि समाज से हैं।
हंस राज हंस पहली बार अज्ञातवास में नहीं गए बल्कि इससे पहले 2009 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी वह राजनीति को अलविदा कह गए थे। हंसराज हंस ने मोहिंदर सिंह केपी के मुकाबले शिरोमणि अकाली दल के टिकट पर चुनाव लड़ा था। जालंधर लोकसभा क्षेत्र में वाल्मीकि समाज की वोट करीब एक लाख 75 हजार वोट हैं, जबकि रविदासिया समाज के वोट तीन लाख 60 हजार के करीब हैं। हंस वाल्मीकि समाज से थे और केपी रविदासिया बिरादरी से, जिसका फायदा मोहिंदर सिंह केपी उठा ले गए। हंस की लोकप्रियता भी उनको संसद तक नहीं पहुंचा पाई।
इसके बाद हंस काफी निराश हो गए और राजनीति से दूर निकल गए। एक दो बार तो किसी कार्यक्रम में शिरकत यहां तक कह दिया था कि राजनीति व कलाकार का दूर-दूर तक वास्ता नहीं। इस साल फरवरी में पंजाब में शिअद व भाजपा की दोबारा सरकार बनी तो हंसराज हंस दोबारा राजनीति में दिखाई देने लगे। शिअद ने उनको वाइस प्रेसिडेंट बना दिया। शिअद सुप्रीमो सुखबीर बादल के साथ अकसर दिखाई देने वाले हंसराज हंस ने कांग्रेस के कई वाल्मीकि समाज के अग्रणी नेताओं को तोड़कर शिअद की झोली में डाल दिया। इसके बाद हंस एक बार फिर राजनीति में चमकने लगे। शिअद में फिर से कयास लगाए जाने लगे कि हंस को शिअद मैदान में उतारेगा।
पिछले दो-तीन माह से हंसराज हंस अचानक गायब हो गए हैं। शहर में कोई बड़ा आयोजन हो या फिर राजनीतिक कार्यक्रम, हंस की अनुपस्थिति सबको खटक रही है। शिअद के कुछ दिग्गज ऐसा भी कह रहे हैं कि अभी हंस को हरी झंडी नहीं मिली है, इसलिए उनकी सक्रियता कम हो गई है क्योंकि अभी लोकसभा चुनावों में काफी समय है। इस बार शोभायात्रा में उनके बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने की उम्मीद थी लेकिन वह दिखाई नहीं दिए। हंसराज हंस की तस्वीरों के होर्डिंग्स लगाने वाले भावाधस के राष्ट्रीय संचालक सुभाष सोंधी का कहना है कि इसमें कोई संदेह नहीं कि उनकी सक्रियता कम हुई है, उनको शोभायात्रा में भी आना था लेकिन वह नहीं आए पाए। सोंधी कहते हैं कि शायद हंस उस दिन दिल्ली में थे, किसी के शोक में गए हुए थे।
अमर उजाला ने हंस से पूछा कि उनकी सक्रियता क्यों कम हो गई तो वह खुलकर कोई कारण नहीं बता सके। इतना जरूर कहा कि वह सबके साथ संपर्क में है, वह नजर क्यों नहीं आते, इस पर हंस कुछ नहीं बोले, संकेत दिया कि पार्टी जैसा चाहती है, वह वैसा कर रहे हैं। चर्चा यह भी उठ रही है कि हंस के नाम को इस बार सुखबीर बादल जल्दबाजी में फाइनल नहीं करना चाहते।
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