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कालेज की मैगजीन में कहानी लिखकर शुरू किया यशजी ने कैरियर

Jalandhar

Updated Mon, 22 Oct 2012 12:00 PM IST
जालंधर। फिल्म निर्देशन और निर्माण में बुलंदियां छूने वाले यश चोपड़ा अपने उस कालेज को हमेशा दिल में बसाए रहे, जहां से उन्होंने आसमां की उड़ान की शुरुआत की थी। पढ़ाई के दौरान जालंधर के दोआबा कालेज की मैगजीन में उनकी पहली कहानी, जो उनकी कला के क्षेत्र में पहली एंट्री थी। अपने प्रिंसिपल से मिले इस मौके को उन्होंने कैरियर का लक्ष्य बना लिया। इसी कारण वह पंजाब आने पर कालेज जरूर पहुंचते थे और यहां की मिट्टी को अपने माथे पर लगा लेते थे। वह दोआबा को कालेज को हर साल एक लाख रुपये की सहायता देते थे।
यश चोपड़ा का बेशक बॉलीवुड में आसमान की बुलंदियों को छू गए थे, लेकिन उनको असली प्रेराणा उनको जालंधर स्थित दोआबा कालेज के कार्यकारी प्रिंसिपल से मिली थी। इसी प्रेरणा के चलते ही उनके गुण दोआबा कालेज में स्नातक के दौरान ही दिखने लगे थे।
दोआबा कालेज जालंधर के प्रसिद्ध देवी तालाब मंदिर के सामने है। इसी कालेज में 1945 में यश चोपड़ा स्नातक की पढ़ाई की थी। उस समय कालेज के कार्यकारी प्रिंसिपल डीडी विबरा थे। प्रोफेसर विबरा अंग्रेजी विभाग के हेड ऑफ डिपार्टमेंट थे, लेकिन वह यश चोपड़ा के भीतर छिपे गुणों को परखने में माहिर थे और उन्हें प्रेरित करते थे। बताते हैं कि प्रोफेसर विबरा ने उस समय कालेज की तरफ से दोआब मैगजीन शुरू की थी, जिसमें पहली कहानी यश चोपड़ा की छपी थी। यहीं से यश चोपड़ा की कला निखरनी शुरू हुई। दोआबा कालेज की मैगजीन से ही विख्यात होकर यश चोपड़ा सफलता की सीढ़ियां चढ़ते गए। इसीलिए अंतिम समय तक वह हर साल एक लाख रुपये दोआबा कालेज को भेजते थे।
कालेज में स्टूडियो बना जिसमें न्यूज रीडिंग, वीडियो शूट, आरजेइंग, एडिटिंग का काम शुरू हुआ। इस स्टूडियो के लिए सारा सामान खुद यश चोपड़ा ने तय किया और खुद ही खरीदा। उनकी मर्जी से स्टूडियो तैयार किया गया। आज भी दोआबा कालेज उनकी याद की कहानी को बयान करता है। यहां के प्रिंसिपल नरेश धीमान का कहना है कि आज भी दोआबा कालेज में जो भी प्रोडक्शन का काम हो रहा है, वह यश चोपड़ा के ही दिशा-निर्देश पर ही है। यश चोपड़ा से जब भी कालेज में नई चीज शुरू करने, कार्यक्रम में बुलाने की बात की गई, उन्होंने कभी इनकार नहीं किया।
स्टेशन पर बुला लिया प्रिंसिपल को
‘रब ने बना दी जोड़ी’ की रिलीज के बाद यशजी अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में मत्था टेकने के लिए आए थे। वापसी में उनकी शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन जालंधर में खड़ी हो गई। उन्होंने तुरंत ही दोआबा कालेज के तत्कालीन प्रिंसिपल आरपी भारद्वाज को फोन किया और स्टेशन पर ही कालेज के बारे में जानकारी ली और कुछ नया करने को कहा।
एम. प्रतीक
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