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मानसून में देरी और पावरकट ने मारी किसान को दोहरी मार

Jalandhar

Updated Fri, 06 Jul 2012 12:00 PM IST
जालंधर। सूबे में मानसून में देरी और बढ़ रहे पावरकटों ने किसानों को दोहरी मार मारी है। अब धान की बुआई कर पंजाब का किसान खुद को फंसा हुआ देख रहा है और समाधान जुटाने में जुट गया है। राज्य सरकार ने धान की फसल की बुआई के पहले किसानों को आठ घंटे बिजली देने का वादा किया था। इस वादे पर पावरकाम ने मुहर लगाई थी, लेकिन अब मानसून की देरी की मार झेल रहे किसान को आठ घंटे के बजाय सिर्फ पांच घंटे ही बिजली मिल रही है। इससे धान की फसल पर खतरा मंडराने लगा है। इस परेशानी की शिकन किसानों के चेहरों पर साफ दिखाई दे रही है। वहीं पावरकाम भी आठ घंटे आपूर्ति न करने का ठिकरा मानसून पर ही थोप रहा है।
किसान बलदेव सिंह का कहना है कि सरकार और पावरकाम का आठ घंटे बिजली देने का दावा झूठा है। किसानों को पांच घंटे बिजली मिल रही है। वह भी रुक रुक कर यानी बिजली कटों के साथ। अब किसानों को जनरेटरों का सहारा लेना पड़ रहा है जिस पर रोजाना 1500 से 2000 रुपये डीजल के खर्च हो रहे हैं। बलदेव सिंह का कहना है कि उनकी 13 एकड़ जमीन में से आठ पर फसल लगा दी गई है जबकि पांच एकड़ पर धान की बुआई बाकी है। वे धान लगाकर फंस गए हैं। किसान कर्म सिंह का कहना है कि मानसून में देरी होने के कारण पानी का स्तर नीचे गिर गया है। बिजली भी नहीं मिल रही। धान की फसल को पानी अधिक चाहिए, पानी न मिलने के कारण खेतों में धान की फसल खराब हो रही है। सरकार को समाधान ढूंढना चाहिए।

बॉक्स
ओवरलोडिंग के कारण आ रही समस्या : पावरकाम
पावरकाम के डिप्टी डायरेक्टर अरुण वर्मा का कहना है कि राज्य में ग्रामीण क्षेत्रों के पांच सौ से ज्यादा ग्रिड हैं। इनमें 140 से 160 ग्रिड ओवरलोड चल रहे हैं। यहां किसानों को पांच घंटे बिजली मिल रही है, लेकिन बाकी ग्रिड पर छह से सात घंटे बिजली दे रहे हैं। कुछ समस्या आने पर यह पांच घंटे भी रह जाती है। मानसून में देरी होने के कारण समस्या आ रही है। इसे मानसून ही दूर कर सकता है।
पानी की कमी धान के लिए परेशानी
कृषि विभाग के एडीओ नरेश गुलाटी का कहना है कि धान की फसल के लिए पानी जरूरी है। पानी न मिलने से पापड़ी बन जाती है। पत्ते भी पीले पड़ जाते हैं और झाड़ भी कम निकलता है। पानी की कमी से धान की फसल पर कीट और सड़ने का डर भी रहता है।
ऐसे निकल सकता है समाधान
एडीओ नरेश गुलाटी का कहना है कि अगर धान को भी गेहूं व अन्य फसल की तरह बीजा और आम फसलों की तरह ही पानी दिया जाए तो काफी कम पानी लगता है। किसानों को यह रास्ता अपनाना चाहिए।
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