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धर्मू चक्क का बच्चा-बच्चा बना फरियादी

Amritsar

Updated Tue, 10 Jul 2012 12:00 PM IST
धर्मू चक्क (अमृतसर)। गांव धर्मू चक्क के लोगों के सिर अंतरराष्ट्रीय पहलवान एवं गांव के सपूत दारा सिंह की सेहत सुधार की प्रार्थना के साथ भगवान के आगे झुके हुए हैं। गांव के लोग भगवान के दर पर झोली फैला कर दारा सिंह की लंबी आयु के लिए दुआ कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि धर्मू चक्क का बच्चा-बच्चा फरियादी बन गया हो और सारा गांव अल्हा की दरगाह। गांव के हर कोने में दारा सिंह की सेहत की चर्चा चल रही है। लोग सिर्फ दारा के स्वस्थ होने की ही मुरादें मांग रहे हैं।
धर्मू चक्क गांव के लिए दारा सिंह एक नेक इंसान ही नहीं बल्कि एक मसीहा है। गांव के बच्चे-बच्चे के दिल में उनके लिए अथाह प्रेम है। अमर उजाला की टीम सोमवार को उनके गांव पहुंच वहां हालचाल जाना। मेन रोड से करीब पांच किलोमीटर एक टूटी फूटी व गड्ढों से भरी सड़क के साथ जुड़ा गांव धर्मू चक्क अभी भी पिछड़ा हुआ गांव है। दारा सिंह ने अपने गांव के लिए विकास के लिए बहुत कोशिशें की परंतु गांव के लोग को सरकारों से उनकी भलाई की कोई आशा नहीं है। गांव में तीन गुरुद्वारे, एक शिव मंदिर और छह पीरों की मजारें हैं। हर धार्मिक स्थान पर सिर्फ एक ही प्रार्थना कि साडा दारा ठीक हो जाए. . .।
गांव में बीचोबीच करीब सौ वर्ष पुराने बरगद के पेड़ के पास ही दारा सिंह की हवेली है। पुराने स्टाइल में बनी यह हवेली आज भी गांव की शान है। गांव में बेशक आज बहुत से पक्के घर और कोठियां बन चुकी हैं परंतु दारा सिंह के घर की पहचान अलग ही है। यह घर किसी समय चहल-पहल का केंद्र हुआ करता था। दारा सिंह की पैतृक हवेली में भगवान राम का दरबार बना हुआ है। सारा परिवार इस राम दरबार में पूजा पाठ करता है। दारा की भाभी गुरमीत कौर कहतीं हैं कि जब भी दारा यहां आते हैं तो रसोई के साथ बने इस राम दरबार में माथा जरूर टेकते हैं। जब दारा सिंह को पहली बार रामायण फिल्म में हनुमान की भूमिका मिली थी, तब से ही उन्होंने भगवान राम को अपना ईष्ट मान लिया था। वैसे दारा धार्मिक तौर पर कट्टर नहीं है और हर धार्मिक जगह पर शीश नंवाते हैं।
अब यहां दारा सिंह के भतीजे बलजीत सिंह उर्फ बल्ला अपने परिवार के साथ रहते हैं। दारा सिंह के भाई एसएस रंधावा का मुंबई में बिल्डर हैं। गांव में परिवार की करीब 30 एकड़ भूमि को ठेके पर दिया हुआ है। एक समय था जब दारा सिंह के पिता सूरत सिंह इस जमीन पर खेती किया करते थे। दारा सिंह अपने पिता की मौत के वक्त 2008 में गांव आए थे। बाद में एक बार वे गांव में स्टेडियम का शुभारंभ करने भी पहुंचे परंतु इसके बाद वे उनके दीदार नहीं कर सके।
बीस वर्ष के थे, तभी गांव से चले गए थे
दारा सिंह भतीजे बल्ला बताते हैं कि जब दारा सिंह जब 20 साल के थे तभी वे काम की तलाश में विदेश चले गए थे। सिंगापुर में मेहनत मजदूरी करते हुए वहां रहने वाले कुछ भारतीयों ने उन्हेें कुश्ती के लिए प्रेरित किया। वहां के भारतीयों ने उनके लिए बदाम और अन्य खुराक का इंतजाम किया। बचपन में वे कुश्ती नहीं लड़ते थे सिगांपुर जाकर उन्होंने इस खेल की शुरुआत की। बचपन में वह अपने दोस्तों के साथ घर के पास ही बरगद के पेड़ के नीचे बनी चौपाल के पास थोड़ी बहुत जोर अजमाईश कर लिया करते थे। गांव के आसपास कभी मेला लगा होता तो वहां जाकर भी कभी कभी अखाड़े की मिट्टी से शरीर को पवित्र कर पहलवानी का अभ्यास कर लेते थे।
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