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इकलौते मां कूष्मांडा के मंदिर में दूर होते हैं नेत्र विकार

Kushmanda devi increases eyesight

नवरात्र की चौथी देवी माता कूष्मांडा का एकमात्र मंदिर पूरे प्रदेश में सिर्फ कानपुर के घाटमपुर कसबे में है। मान्यता है कि मां की पूजा-अर्चना करने के बाद मूर्ति से नीर लेकर आंखों पर लगाने से दिव्य नेत्र ज्योति मिलती है जिससे सारे नेत्र विकार दूर हो जाते हैं। नवरात्र पर्व पर मंदिर में मेला लगता है। चतुर्थी तिथि पर हजारों भक्त माता के दर्शन करने आते हैं। मनोकामना पूरी होने पर मैया को चुनरी, ध्वजा, नारियल और घंटा चढ़ाने के साथ ही भीगे चने अर्पण करते हैं।
भदरस गांव निवासी कवि उम्मेदराय खरे की सन् 1783 में फारसी में लिखी गई पांडुलिपि (ऐश आफ्जा) में माता कूष्मांडा और पड़ोसी गांव भदरस की माता भद्रकाली के स्वरूपों का वर्णन किया है। कानपुर इतिहास के लेखक लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और नारायण प्रसाद अरोड़ा ने घाटमपुर की कूष्मांडा देवी का उल्लेख किया है। इतिहासकारों के मुताबिक कभी यहां घना जंगल था। कुड़हा नामक चरवाहा वहां गायें चराने जाता था। गाय झाड़ी के पास खड़ी होकर अपना दूध गिरा देती थी। चरवाहे ने इसकी निगरानी की उसे रात में स्वप्न में माता ने दर्शन दिए। झाड़ी के नीचे खोदाई करने पर मां कूष्मांडा प्रकट हुईं, उसी स्थान पर स्थापित करवाया गया। चरवाहे कुड़हा के नाम पर मां कूष्मांडा का एक नाम कुड़हा देवी भी है। स्थानीय लोग इसी नाम से पुकारते हैं। इतिहासकारों के मुताबिक कूष्मांडा देवी के वर्तमान मंदिर का निर्माण 1890 में कसबे के चंदीदीन भुर्जी ने कराया था। सितंबर 1988 से मंदिर में मां कूष्मांडा की अखंड ज्योति निरंतर प्रज्ज्वलित हो रही है।

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