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दृष्टा की दृष्टि सुधरे तो सृष्टि भी सुधरेगी

सफीपुर। सत्संग सनातन है। ब्रह्म, जीव, माया और धर्म भी सनातन हैं। यही सनातन धर्म अज्ञानता को दूर कर दिव्य दृष्टि देता है। इससे हमारा मन, मस्तिष्क परिष्कृत होता है और हम दिव्य आनंद की अनुभूति करने लगते हैं। यदि दृष्टा की दृष्टि सुधर जाए तो सृष्टि भी सुधर जाएगी। फिर दीनता, निराशा, ताप और भय मिट जाएगा।
स्थानीय बाबू भगवतीचरण वर्मा पार्क में चल रहे सनातन धर्म सत्संग सम्मेलन
के दूसरे दिन शुक्रवार को आचार्य पुरुषोत्तम त्रिवेदी ने यह विचार व्यक्त किए।
उन्होंने सनातन शब्द की सारगर्भित व्याख्या की। उनका कहना था प्रकृति ही सनातन है। इसके नियम, आचार-व्यवहार, नैतिक सिद्धांत सभी सत्य पर आधारित हैं। संसार में जीव का आवागमन, सुख दुख कर्म अकर्म आदि सनातन हैं और सत्य हैं। इनको कोई झुठला नहीं सकता। माया, मोह, क्रोध, लोभ आदि विकारों से घिरने पर मनुष्य की पवित्र दृष्टि भी अज्ञानता से अपवित्र हो जाती है। वह भ्रमित हो जाता है। वह अपने सामाजिक संबंधोें को भूल विपरीत आचरण करने लगता है। इसके परिणाम स्वरूप मानव दुख भोगने लगता है। यही दृष्टि दोष समाप्त करने की आवश्यकता है। जालौन के रमेश रामायणी ने भी सनातन धर्म को अविनाशी बताया। कहा इसे नष्ट करने का प्रयास सफल नहीं हो पाएगा। प्रत्येक वस्तु का नैसर्गिक धर्म होता है। जैसे मिठाई का मीठापन और मिर्च का कड़ुवापन उसका सनातन धर्म है। इसी प्रकार मनुष्य का भी सनातन धर्म मनुष्यता है। इसके अभाव में उसकी कोई कीमत नहीं है। यह भी सनातन प्रक्रिया है। सत्ंसग सम्मेलन में संत स्वामी रामस्वरूप ब्रह्मचारी, बजरंगदास, मनोज कुमार, द्विजेंद्र बाजपेई, राजेश शास्त्री आदि वक्ताओं ने भी पौराणिक संदर्भों के माध्यम से प्रवचन कर
श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक सुख से आनंदित किया।

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