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इस तबाही के गुनहगार

उत्तराखंड और हिमाचल के बड़े हिस्से आज जिस आपदा से जूझ रहे हैं, उसके लिए बारिश के कहर के साथ ही बेतरतीब विकास भी कम जिम्मेदार नहीं है।

उफनती नदियां, पत्तों की तरह गिरते मकान, खाई में बदलती सड़कें, खिलौने की तरह बहते वाहन, गले-गले तक डूबे लोग और थरथराता पहाड़, हालात को बयां करने के लिए ये मंजर काफी है। ऐसे हादसों के समय ही पहाड़ की दुभर जिंदगी का दर्द दुनिया के सामने आता है।

निश्चित ही कई दशकों बाद उत्तर भारत में जून के महीने में ऐसी भयंकर बारिश हुई है, लेकिन गंगा और उसकी सहायक नदियों ने जिस तरह का तांडव दिखाया है, उससे साफ है कि अतीत के हादसों से कोई सबक नहीं लिया गया है। उत्तराखंड और हिमाचल प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से तो पहले से ही अतिसंवेदनशील हैं, लेकिन उस दिल्ली का क्या, जहां हरियाणा से छोड़े गए पानी के कारण बाढ़ आ जाती है।

आज जो स्थिति है, उससे आपदा प्रबंधन की हमारी बेबसी ही उजागर हो रही है। कहने को तो राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का भी गठन किया गया है, लेकिन उसकी अपनी सीमाएं हैं। असल में यह सोचने की जरूरत है कि उत्तराखंड और हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्यों का जरूरत से ज्यादा दोहन न हो, मगर इसका ठीक उल्टा हो रहा है।

गंगा और उसकी सहायक नदियों पर जिस तरह से बांध और पनबिजली परियोजनाएं बनाई गई हैं, उससे यहां का पर्यावरण संतुलन बुरी तरह से बिगड़ रहा है। इसके अलावा जंगलों की कटाई और अवैध खनन ने भी इसमें कम योगदान नहीं दिया है। बची-खुची कसर भवन निर्माण के कायदे-कानूनों को ताक पर रखकर पूरी कर दी गई है, वरना ऐसा कैसे होता कि नदी के किनारे इमारतों की कतारें खड़ी कर दी जातीं।

यह तो सबको पता था कि यह चार धाम और अन्य तीर्थ स्थलों की यात्रा का समय है, इससे यहां स्वाभाविक रूप से यात्रियों का दबाव होता है, ऐसे में यदि हजारों लोग लापता हैं, तो समझा जा सकता है कि प्रशासनिक स्तर पर जैसी तैयारियां होनी चाहिए, वह नहीं की गईं।

यह विडंबना ही है कि मौसम विभाग के अनुमानों के मुताबिक इस वर्ष पूरे देश में मानसून ने समय से पहले ही दस्तक दे दी है, लेकिन देश के एक हिस्से में यह कहर बनकर आया है। यह खतरे की घंटी है।

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