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कुछ भी नहीं बदला

Nothing has been change
राजधानी दिल्ली में पिछले वर्ष 16 दिसंबर को हुई बलात्कार की घटना के बाद पूरा देश उद्वेलित था, नतीजतन महिलाओं का उत्पीड़न रोकने के लिए कड़ा कानून बनाए जाने से लेकर महिला बैंक की स्थापना जैसी पहल तक की गई। मगर बंगलूरू जैसे अपेक्षाकृत सुसंस्कृत माने जाने वाले शहर में एक एटीएम के भीतर एक सिरफिरे ने जिस तरह एक महिला बैंक अधिकारी को निशाना बनाया, उससे यही साबित होता है कि चाहे लाख दावे किए जाएं, महिलाओं की सुरक्षा आज भी एक बड़ा मसला है।

और यह कोई अकेली घटना नहीं है, इसी दिन मुंबई में एक अभिनेत्री के साथ छेड़छाड़ का मामला सामने आया, तो उत्तर प्रदेश में सरकारी खैरात के रूप में मिले लैपटॉप लेकर लौट रही एक छात्रा को बलात्कार का शिकार होना पड़ा। ऐसे में यदि अमेरिकी राजदूत नैंसी पॉवेल कह रही हैं कि भारत में महिलाओं की असुरक्षा और बलात्कार की बढ़ती घटनाओं की वजह से अमेरिका छात्र यहां आने से कतराते हैं, तो उस पर गौर करने की जरूरत है।

अकेले दिल्ली की ही बात करें, तो पिछले वर्ष की तुलना में यहां महिलाओं के खिलाफ अपराध के 70 फीसदी अधिक मामले दर्ज किए गए हैं! और यह बात खुद पुलिस ने अभी थोड़े दिन पहले ही सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष स्वीकार की है। इसके पीछे हो सकता है कि महिला अपराधों के प्रति बढ़ती जागरूकता भी एक वजह हो, जिससे पहले की तुलना में ऐसे मामले अधिक संख्या में पुलिस के पास पहुंच रहे हों।

मगर महिलाओं की सुरक्षा लैंगिक असमानता से भी जुड़ी हुई है, जिसके चलते समाज का एक तबका उन्हें भोगने की चीज ही मानता है। हैरत नहीं कि इसका शिक्षा से कोई खास लेना देना नहीं है; सर्वोच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश के खिलाफ विधि की एक छात्रा के उत्पीड़न के आरोप इसकी पुष्टि करते हैं।

निश्चय ही, भारतीय महिला बैंक महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में एक अच्छी पहल है, मगर यह प्रतीकात्मक कदम ही है। पुलिस व्यवस्था को दुरुस्त किए बिना हम महिलाओं की सुरक्षा की उम्मीद नहीं कर सकते। अभी देश में प्रति विशिष्ट व्यक्ति की सुरक्षा में तीन पुलिसकर्मी तैनात होते हैं, वहीं 761 व्यक्तियों की सुरक्षा के लिए सिर्फ एक पुलिसवाला होता है! इस फासले को कम करने की जरूरत है।

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