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दीदी के राज में लड़कियां

girls condition in west bengal
पश्चिम बंगाल के बीरभूम में एक आदिवासी लड़की को अपने समुदाय से बाहर प्रेम करने की जो सजा उसके अपने ही समाज ने दी, उसे बर्बर और अमानवीय कहना भी शायद उस युवती की पीड़ा को कम करके आंकना होगा। जुर्माना न चुका पाने के कारण स्थानीय पंचायत के निर्देश के मुताबिक उसके साथ उन लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया, जो रिश्ते में उसके चाचा और भाई लगते थे! इसकी तुलना करीब बारह साल पहले पाकिस्तान में मुख्तारन माई के साथ हुए सुलूक से की जा रही है।

जो बीरभूम कभी अपने समृद्ध लोकशिल्प, बाउल गीत और साहित्यकार ताराशंकर बंदोपाध्याय के कारण जाना जाता था, राज्य की कुल बदहाली के बीच उसकी वह पहचान कब बदल गई, पता भी नहीं चला। चार साल पहले उसी जिले में आदिवासी समाज ने एक लड़की को विजातीय प्रेम के लिए दंडित किया था।

राज्य के आदिवासी बहुल इलाकों में ग्रामीण पंचायतों (सालिशी सभा) की परंपरा बहुत पुरानी है; वाम मोर्चा सरकार ने दीवानी मामलों में ऐसी पंचायतों को कानूनी शक्ल देने की विफल कोशिश की थी। पर यह तो अकल्पनीय है कि कोई पंचायत किसी लड़की के मामले में इस हद तक चली जाए। आदिवासी समाज को अपेक्षाकृत उदार माना जाता रहा है। लेकिन चूंकि मौजूदा विकास नीति में उनकी कोई जगह नहीं है, ऐसे में, आदिवासी लड़कियां एक तरफ शहरों-महानगरों में शोषण का शिकार हो रही हैं, तो दूसरी ओर, आदिवासी समाज के भीतर उदारता की जगह कट्टरता ने ले ली है।


यह घटना एक और उदाहरण है कि ममता बनर्जी के राज में लड़कियां ही सुरक्षित नहीं हैं। प्रशासन-व्यवस्था के मामले में चुस्ती तो दूर, बलात्कार की ऐसी हर घटना को वह जिस तरह तृणमूल सरकार को बदनाम करने की साजिश बताती हैं, वह ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है।

क्या विडंबना है, वाम मोर्चे के शासन में जो ममता बनर्जी तापसी मल्लिक की कथित बलात्कार के बाद हत्या को भावुक राजनीतिक मुद्दा बना लेती हैं, सत्ता में आने के बाद कामदुनी, मध्यमग्राम, खिदिरपुर में घटी ऐसी घटनाओं पर वह चुप्पी साध लेती हैं। इसीलिए बीरभूम की घटना में लिप्त दोषियों को शिकंजे में कसने के बावजूद यह भरोसा मिलना अभी दूर है कि पश्चिम बंगाल में लड़कियां सुरक्षित हैं।

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