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तीसरे मोर्चे की कवायद

Exercise for third front
वामपंथी पार्टियों की पहल पर दिल्ली में हुआ सांप्रदायिकता विरोधी सम्मेलन दरअसल तीसरे मोर्चे को झाड़-पोंछकर खड़ा करने की ही एक कवायद है। इसमें दो राय नहीं कि भारतीय राजनीति में गैर कांग्रेस और गैर भाजपा की एक धारा रही है, लेकिन बीते दो-ढाई दशक का अनुभव बताता है कि ऐसा कोई भी गठबंधन टिकाऊ साबित नहीं हुआ है। इसलिए यह जो नई पहल हो रही है, उसे भी संशय की नजर से ही देखा जा रहा है।

हालांकि इसे बदलते राजनीतिक परिदृश्य को ध्यान में रखकर भी देखने की जरूरत है, क्योंकि कांग्रेस की अगुआई वाला सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन विखंडित होता नजर आ रहा है, तो नरेंद्र मोदी को कमान सौंपने के बावजूद भाजपा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का विस्तार नहीं कर पाई है।

मगर यह भी सच है कि अतीत में तीसरे मोर्चे की कवायद अवसरवादी गठजोड़ ही साबित हुई है। हालत यह है कि सम्मलेन में शामिल मुलायम सिंह यादव से लेकर नीतीश कुमार और यह पहल करने वाले वामपंथी दल भी संभावित तीसरे मोर्चे पर खुलकर बात नहीं कर रहे हैं और न ही ऐसे कोई संकेत मिले हैं कि उनके बीच आने वाले चुनावों के लिए किसी तरह का सीटों का तालमेल हो पाएगा। सांप्रदायिकता के खिलाफ एकजुट होने के बावजूद इन दलों के अंतरविरोध भी कम नहीं हैं। फिर मुलायम सिंह, नीतीश कुमार और जयललिता तक की प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा भी छिपी नहीं है।

ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि उनका यह साथ किसी मजबूत गठबंधन में बदल ही पाएगा। निश्चय ही मुजफ्फरनगर के दंगों ने यह दिखाया है कि सांप्रदायिकता की छोटी-सी चिंगारी कैसे दावानल में बदल सकती है, इसलिए सांप्रदायिक सौहार्द आज एक बड़ा मुद्दा है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी विकास और समन्वय की चाहे लाख दुहाई दें, अतीत उनका पीछा नहीं छोड़ रहा है और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का मुद्दा केंद्र में है। राहुल गांधी के कुछ बयानों ने इस आग में घी का ही काम किया है। मगर इसके साथ ही मुलायम सिंह और नीतीश कुमार को भी यह समझने की जरूरत है कि बहुसंख्यक ध्रुवीकरण की राजनीति जितनी खतरनाक होती है, उससे कम खतरनाक अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की राजनीति नहीं होती।

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