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मिस्र: मौत की सज़ा के खिलाफ़ हिंसा, 30 मरे

मिस्र की अदालत ने पिछले साल फुटबॉल मैच के दौरान हुए दंगे के मामले में 21 लोगों को मौत की सज़ा सुनाई है। इस दंगे में 74 लोगों की मौत हो गई थी। अदालत के इस फैसले के बाद फिर से वहां ताज़ा हिंसा शुरू हो गई है जिसमें 30 लोगों की मौत हो गई है।

पोर्ट सईद स्टेडियम में हुए एक टॉप लीग फुटबॉल मैच के बाद शुरू हुआ दंगा मिस्र के फुटबॉल के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी साबित हुई।

अदालत का फैसला आने के साथ ही पोर्ट सईद में लोगों का गुस्सा भड़क गया। जिन लोगों को यह सज़ा सुनाई गई थी उनके समर्थकों और पुलिस के बीच झड़प हुई।

मिस्र में होस्नी मुबारक को सत्ता से बेदखल किए जाने की दूसरी वर्षगांठ के मौके पर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद, यह ताज़ा हिंसा भड़की है।

शुक्रवार को हज़ारों की तादाद में प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति मोहम्मद मोरसी का विरोध करते हुए अपनी आवाज़ बुलंद की थी। उनका कहना था कि मोरसी ने क्रांति के साथ धोखा किया है।

मामला
पिछले साल के दंगे की वजह से यह फुटबॉल लीग टल गई। पोर्ट सईद में खेल खत्म होने के बाद यह दंगा शुरू हो गया था। स्थानीय टीम अल-माज़री के प्रशंसक पिच पर उतर आए और उन्होंने काहिरा क्लब के अल-अहली के समर्थकों पर पत्थरबाज़ी और आतिशबाज़ी शुरू कर दी।

अल-अहली समर्थकों के एक वर्ग ने पूर्व राष्ट्रपति मुबारक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने में अहम भूमिका निभाई थी।

शनिवार को जिन 21 लोगों को मौत की सज़ा सुनाई गई है वे अल-माज़री के फैन हैं। काहिरा की अदालत में न्यायाधीश के इस फैसले की घोषणा करते ही पीड़ितों के रिश्तेदारों में खुशी की लहर दौड़ गई।

अधिकारियों का कहना है कि इस ताज़ा हिंसा में मरे 26 लोगों में से दो पुलिसकर्मी हैं। हिंसा के मद्देनजर सेना की टुकड़ियां शहर की सड़कों पर तैनात कर दी गई है।

अपने फैसले की घोषणा करते हुए न्यायाधीश ने कहा कि 9 मार्च को बाकी अभियुक्तों के बारे में फैसला सुनाया जाएगा।

हिंसा जारी
शुक्रवार को राजधानी काहिरा के तहरीर चौक पर सरकार विरोधी एक रैली निकाली गई थी और विपक्ष के समर्थक पुलिस के साथ भिड़ गए थे। मिस्र के 27 प्रांत में से 12 में विरोध प्रदर्शन और हिंसक झड़पें हुईं। वहीं स्वेज शहर में फैली हिंसा में कम से कम छह लोगों की मौत हो गई।

उधर, इस्लामिया में प्रदर्शनकारियों ने मुस्लिम ब्रदरहुड पार्टी के मुख्यालय में आग लगा दी। काहिरा के तहरीर चौक पर मौजूद एक प्रदर्शनकारी का कहना था, “हमें न स्वतंत्रता मिली है और न सामाजिक न्याय। बेरोज़गारी और निवेश से जुड़ी समस्या का कोई हल नहीं निकल पाया है। पूरी अर्थव्यवस्था ही धराशायी हो गई है।”

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