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'पानी' की कहानी, शेखर कपूर की जुबानी

'पानी' शेखर कपूर का ड्रीम प्रोजेक्ट है। हम पिछले कई सालों से इस फिल्म के बारे में सुन रहे हैं। इस विषय पर फ़िल्म बनाने के बारे में शेखर कपूर ने पंद्रह-सोलह साल पहले सोचा था। शेखर अपने ब्लाग में भी लगातार इस टॉपिक और अपने इस प्रोजेक्ट पर लिखते रहे हैं।

शेखर इस फिल्म के लिए कई साल भटके। कभी हॉलीवुड के स्टूडियो तो कभी डैनी बोएल के पास। यहां तक कि बीते साल उन्होंने लोगों से फंड इकट्ठा करके इस फिल्म को बनाने के बारे में सोचा था। अब आदित्य चोपड़ा की मदद से उनका यह सपना पूरा होने जा रहा है।

फ्यूचरिस्टिक फिल्म
शेखर अपनी इस फिल्म पर किसी गोपनीय प्रोजेक्ट की तरह काम करने की बजाय एक अवेयरनेस कैंपेन तरह काम कर रहे हैं। समय-समय पर उन्होंने मीडिया से इस फिल्म के बारे में बहुत कुछ शेयर भी किया।

शेखर कहते हैं, "जब पंद्रह-सोलह साल पहले इसकी कहानी लिखी थी तब लोग इस बारे में बात ही नहीं करते थे। साल-दो साल पहले भी जब मैंने इस फ़िल्म के विषय में लोगों से बात की, तब भी उनकी इसमें रुचि नहीं थी। लेकिन अब ये एक बड़ा प्रोजेक्ट बन गई है।"

'पानी' की कहानी बड़ी ही दिलचस्प है। शेखर बताते हैं, "मैं पानी पर एक फ़्यूचरिस्टिक फ़िल्म बना रहा हूँ। फ़िल्म की कहानी में भविष्य में एक शहर में पानी ख़त्म हो जाता है और पानी को लेकर लड़ाई शुरु हो जाती है।"


कल्पना नहीं, भयावह हकीकत
उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में बताया, "जिन लोगों के पास पानी है वो उसे जमा करते हैं और हथियारों से उसकी रक्षा करते हैं। पानी को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करके वो दूसरे लोगों को दबाते हैं। इस बात को लेकर एक क्रांति आ जाती है जिसकी कहानी है पानी।"

शेखर मानते हैं कि यह फिल्म पूरी तरह काल्पनिक नहीं है। नलों में पानी हमेशा नहीं रहेगा। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बेमौसमी मानसून आ रहे हैं। हम नहीं देख पा रहे हैं कि हो सकता है एक अलग संसाधन के रूप में पानी रहे ही नहीं। हमें इसे सावधानी से इस्तेमाल करने की जरूरत है।

भूजल स्तर घट गया है और हैंडपंपों में पानी खत्म हो रहा है। चेन्नई पहले से ही पानी की कमी की मार झेल रहा है, जबकि दूसरी ओर पांच-सितारा होटलों में लोग आधे-आधे घंटे तक नहाते रहते हैं।

शेखर की फिल्म में भी लोगों का शोषण और नियंत्रण करने के लिए पानी का इस्तेमाल होगा। शायद लोग वहां काम नहीं करेंगे, जहां पीने का पानी नहीं मिलेगा। लोग उन कंपनियों में काम करेंगे जहां पानी मिलेगा, क्योंकि वहां कम से कम 'पानी तो मिलता है पीने को।'

कैसे आया फिल्म बनाने का विचार
एक दिन जब शेखर मालाबार हिल पर अपने मित्र के घर पर उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे, उनका मित्र आधे घंटे से भी ज्यादा देर तक नहाता रहा तो वे वहां से चले आए। रास्ते में उन्होंने धारावी झुग्गियों में पानी के लिए लोगों को लम्बी कतारों में खड़े देखा, जिसका उन पर गहरा असर हुआ।

शेखर अपने एक इंटरव्यू में कहते हैं, "पानी के लिए युद्ध, शायद आज असंगत लगे लेकिन आप देख रहे हैं कि आज पूरे विश्व में पानी के लिए लोग लड़ रहे हैं।"

"टर्की के बीच से नदियां गुजरती हैं, पर वहां की गोलन हाइट्स को लेकर छिड़े विवाद में पानी ही बड़ा मुद्दा है। भारत-पाक विवादों में भी जल को लेकर काफी विवाद है, क्योंकि भारत सतलुज के पानी को रोकने की धमकियां देता है।"

कई सालों का गहन शोध
शेखर कहते हैं, "अगर हमारे पास पानी ही नहीं होगा तो 8-9 फीसदी आर्थिक विकास की बातें करना सब बेमानी ही है। कारखाने बंद हो सकते हैं। बड़ी मात्रा में विस्थापन हो सकता है, यु्द्ध भी हो सकते हैं। इसलिए 'पानी' फिल्म में पानी को विषय बनाया गया है।"

शेखर ने इस फिल्म पर काफी रिसर्च की है। इसका एक उदाहरण उनके ब्लाग पर अपलोड इस वीडियो के रूप में देखा जा सकता है। जिसमें वे एक टैक्सी ड्राइवर से पानी के ही मुद्दे पर बात कर रहे हैं।

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