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आजमाइए महंगाई कम करने का यह फिल्मी नुस्‍खा

'सारे जहां से महंगा' फिल्म महंगाई की समस्या को एक व्यंग्य के अंदाज में पेश करने का प्रयास करती है। फिल्म मेकिंग की स्टाईल में यह 'खिचड़ी', 'चला मुसद्दी ऑफिस-ऑफिस', 'आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैय्या' और 'गली-गली में चोर है' जैसे पैटर्न वाली फिल्म है। फिल्म महंगाई की समस्या को तो दिखाती है पर उसे पेश करती है व्यंग्य और हास्य के रूप में। उसके दर्द को दिखाकर इसे ट्रैजिक नहीं बनाया गया है।

एक उदाहरण देखिए। कालेधन को भारत में लाने के लिए कुछ लोग पिछले कुछ समय से धरने पर बैठे हैं। धरने का संयोजक साइकिल के पंक्चर बनाता है। यह सभी लोग धरने पर इसलिए बैठे हैं कि जैसे ही कालाधन भारत वापस आएगा उन्हें चार-चार लाख रूपए मिलेंगे। बच्चों और महिलाओं को भी कुछ पैसा मिल सकता है। धरने पर बैठे सभी इस बात की गंभीर प्लानिंग कर चुके होते हैं कि वह मिलने वाले इन चार-चार लाख्र रूपयों से करेंगे क्या।

कालेधन को भारत लाने के मुद्दे को हास्य के इस रूप में पेश कर पाना फिल्म की मजबूती है। यह आपको देर तक गुदगुदाए रखता है। तब भी जब फिल्म खत्म हो जाती है। फिल्म की कमजोरियां भी हैं। यह फिल्म कई जगहों पर फिल्म न लगकर एक टेलीफिल्म जैसी लगती है। इसके अलावा फिल्म महंगाई से बचने का एक नुस्‍खा पेश करती है। नुस्‍खे को पेश करना तो ठीक है पर जब फिल्म इस नुस्‍खे को जस्टीफाई करने बैठ जाती है तो वहां यह फिल्म अनप्रैक्टिकल हो जाती है। छोटे-छोटे कलाकारों को लेकर बनायी गयी इस फिल्म को एक बार जरूर देखा जा सकता है। परिवार के साथ देखने पर यह फिल्म ज्यादा मजा देगी।


मध्यमवर्गीय परिवार के सपनों की कहानी

फिल्म की कहानी हरियाणा के सोनीपत में रहने वाले पुत्तन पाल (संजय मिश्रा) और उसके परिवार की है। पुत्तन पाल एक पशु प्रचनन केंद्र में कर्मचारी है। तनख्वाह बहुत कम है और घर चलाना मुश्किल पड़ रहा है। पुत्तन की पत्नी नूरी (प्रगति पांडेय) घर पर ही ब्यूटी पार्लर चला रही होती हैं। पुत्तन का भाई गोपाल, इंटर में तीन बार फेल हो चुका है। घर में खाने के नाम पर लौकी और कद्दू ही बन रहा होता है। पुत्तन के पिता जी (विश्व मोहन) अर्से से मटन और पराठा नहीं खा पा रहे हैं।

महंगाई की वजह से सभी का जीवन घिसट-घिसट के चल रहा होता है। इधर पुत्तन पाल को एक आइडिया सूझता है। वह गोपाल के नाम से एक लाख रूपए का लोन लेता है। सरकारी योजना के तहत उसे यह लोन दुकान खोलने के लिए मिला होता है। पर पूरा परिवार ‌लोन इसलिए लोन लेना चाहता है ताकि वह लोन से मिले रूपयों से एक साथ तीन साल का घरेलू राशन और जरूरी सामान खरीद सकें। ताकि खाने-पीने की चीजों में बढ़ रहे दामों की वजह से उन पर कोई फर्क न पड़े। पुत्तन पाल थोक दुकान से पूरे तीन साल का राशन पानी एक साथ खरीद कर घर ले आता है।

असल समस्‍या तब शुरू होती है जब लोन मिलने के 15 दिन बाद लोन इंस्पेक्टर (जाकिर हुसैन) यह देखने आता है कि लोन ली गयी रकम से दुकान खुली है या नहीं। यहीं से समस्‍या शुरू होती हैं। इंस्पेक्टर को दिखाने के लिए एक नकली दुकान तो खोली जाती है पर उससे कोई सामान नहीं बेचा जाता। इस पूरे घटनाक्रम को एक मजेदार तरीके से दिखाया जाता है। फिल्म के क्लाइमेक्स में महंगाई की समस्या पर एक भावुक सीन है। फिल्‍म का हर किरदार पाता है कि वह किसी न किसी तरह से इस समस्या से पीड़ित है।

हर कलाकार किरदार में फिट

फिल्म की स्किप्ट ऐसी थी जहां किरदारों को अपनी बात रखने के लिए लाउड ऐक्टिंग करनी होती। पर अच्छी बात यह रही कि किसी भी कलाकार ने ओवरऐक्टिंग नहीं की है। यह पूरी फिल्म संजय मिश्रा के इर्द-गिर्द घूमती है। एक मध्यमवर्गीय परिवार के मुखिया के रूप में उन्होंने शानदार ऐक्टिंग की है। वह दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करते हैं। नूरी का किरदार निभाने वाली प्रगति पांडेय भी अपने रोल में फिट बैठी हैं। फिल्म में सबसे ज्यादा प्रभावित पुत्तन के पिता बने विश्व मोहन बदोला करते हैं। एक तेज-तर्रार और हाजिर जवाब बुजुर्ग की भूमिका उन्होंने खूबसूरती से निभायी है। हास्य की डोर उन्हीं के संवादों में उलझी हुई है। जाकिर हुसैन हमेशा की तरह लाजवाब रहे हैं। परफेक्ट डायलॉग डिलवरी के साथ।

फिल्म पहली, पर निर्देशन सधा हुआ

यह अंशुल शर्मा निर्देशित पहली फिल्म थी। इसके पहले अंशुल शर्मा, 'प्यार का पंचनामा' और 'फंस गए रे ओबामा' जैसी चर्चित फिल्मों के एसोसिएट डायरेक्टर रह चुके हैं। इस मामले में अंशुल की तारीफ करनी होगी कि महंगाई जैसे बड़े विषय पर उन्होंने कुछ ऐसे जुमले और किस्से चुने जो ज्यादातर लोगों को शूट करें। फिल्म के निर्देशक की पूरी कोशिश रही है कि यह फिल्‍म महंगाई का स्यापा मनाती हुई न जान पड़े। हास्य के अंदाज में ही उन्होंने इस बात को रखने का प्रयास किया। इसके साथ ही उनकी इस बात की भी तारीफ करनी होगी कि अपेक्षाकृत नए कलाकारों से भी उन्होंने बेहतर काम लिया है। चूंकि फिल्म मुख्य धारा की नहीं थी इसलिए कहीं-कहीं पर यह अपनी मेकिंग स्टाईल से टेलीफिल्म की झलक देती है। कई दर्शकों को यह लगा सकता है कि वह बड़े पर्दे पर बैठकर कोई धारावाहिक देख रहे हैं।

क्यों देखें

महंगाई जैसे चर्चित विषय पर एक मजेदार फिल्म देखने के लिए।

क्यों न देखें

इस फिल्‍म में मुख्य स्ट्रीम की फिल्म जैसा कुछ भी नहीं है। दूसरा यह कि महंगाई जैसे विषयों पर बनी फिल्मों से आप खुद को कितना आनंदित महसूस करते हैं।

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